जीवनमंत्र : एक आदर्श
एक राजा जंगल में घूमने निकले । परंतु जंगल से बाहर निकलने का रास्ता भूल गए । शाम हो गई । राजा को बहुत भूख लगी थी । दूर एक संन्यासी शिष्य की पर्णकुटीर देख भोजन की आशा से राजा ने अंदर प्रवेश किया । संन्यासी शिष्य ने राजा का आदरभाव से स्वागत किया । भोजन कराया । राजा ने उसे चंदन की बाड़ी भेंट में दी । संन्यासी शिष्य को चंदन के वृक्ष के विषय में विशेष कुछ ज्ञान नहीं था । इसलिए उसने चंदन की लकड़ियां काट कर बेचना शुरू कर दिया ।
एक-एक करके सारे ही वृक्षों की लकड़ियां बेच डालीं ।
एक दिन गुरु ने ज्ञानोपदेश में बात की कि, “वन-वन में अगर नहीं होता । जंगल में हजारों वृक्षों में एक चंदन वृक्ष होता है । जिसकी कीमत लाखों में होती है ।” गुरु की बात सुनकर संन्यासी शिष्य को पश्चात्ताप हुआ कि उसने तो पानी के भाव में चंदन की लकड़ियां बेचकर वाड़ी उजाड़ दी ।
शिष्य ने गुरु को बात की । शिष्य की नासमझी और पछतावा देखकर गुरु बोले, “वत्स, पश्चात्ताप मत कर । यह पूरी दुनिया तेरी तरह ही नासमझ है । जीवन का प्रत्येक क्षण बहुत ही कीमती है पर लोग उसे कौड़ी की कीमत पर गंवा देते
हैं ।”
कहानी से मिलने वाला बोध वास्तव में मर्ममय है । चंदन समान मनुष्य जीवन वास्तव में प्रभुभक्ति कर आत्यंतिक मोक्ष पाने के लिए है । परंतु अधिकांश मानव पैसा, पद, प्रतिष्ठा तथा विषयसुख प्राप्त करने के पीछे ही कीमती मनुष्य जीवन कौड़ी की कीमत पर गंवा देते हैं । यही उसका जीवनमंत्र बन गया होता है । और जब खुद ने की हुई भूल का अहसास होता है तब बहुत समय बीत चुका होता है ।
‘Eat, drink and be marry’ यानी कि ‘खाना, पीना और विषय भोगना’ यह जीवनमंत्र अपनाकर जीवन जीने वाला मानव, मानव के वेष में केवल पशु ही
है ।
उत्तम और महान व्यक्ति अपने जीवनरूपी रथ को किसी उच्चतम मूल्यों के साथ आगे हांकते होते हैं । उस जीवनमंत्र से ही महान व्यक्ति की महानता परखी जाती है ।
सत्य और अहिंसा को जीवन का मंत्र बनाकर भारत देश को आज़ादी दिलाने वाले महात्मा गांधी इन्हीं में से एक महान हस्ती थे ।
सिद्धांत में समाधान नहीं और नियम-धर्म में छूट नहीं - इस जीवनमंत्र को जीवन पर्यंत पकड़े रहकर हमारे सभी के जीवन में सिद्धांत और धर्म-नियम के अविचल खूंटे गाड़कर समग्र संप्रदाय में SMVS की एक अलग गुडविल खड़ी करने वाले युगपुरुष यानी हमारे गुरुदेव प.पू. बापजी ।
हम सभी को कार्य का बंधन तुड़वाकर कारण स्वरूप श्रीजीमहाराज की मूर्ति में जोड़ने का संकल्प लेकर इस ब्रह्मांड में पधारे दिव्य सत्पुरुष प्यारे गुरुजी प.पू. स्वामीश्री के जीवन में पल-पल एक जीवनमंत्र के दर्शन होते हैं – ‘अनंत को अनादि की स्थिति करानी ही है ।’
संक्षेप में, जीवनमंत्र यानी निर्धारित जीवन के ध्येय या हेतु को पूर्ण करने के लिए सहायक मूल्य या महत्त्वपूर्ण पहलू, गुणों । जिनके आनुषंगिक रहकर ही ध्येय पूर्ति का मिशन पार करना होता है ।
प्यारे गुरुदेव और प्यारे गुरुजी के योग-समागम से अब बुद्धिकक्षा पर, देह भूमिका पर इतना तो समझ आया है कि हमारा जीवनध्येय है – अवरभाव में महाराज और सत्पुरुष को राज़ी करना और परभाव में अनादि की स्थिति पाकर मूर्ति का सुख पाना । अब उसे लक्ष्यार्थ भूमिका पर ले जाने के लिए ही प्यारे गुरुदेव की आज्ञा-प्रेरणा से गुरुजी ने हमें एक अद्भुत जीवनमंत्र की भेंट दी है ।
जगत के देहधारी जीवों का जीवनमंत्र पैसा, पद, प्रतिष्ठा तथा पंचविषय में आसक्त होना ही है । उत्तम मानव का जीवनमंत्र प्रामाणिकता के मार्ग पर चलना है । जबकि भगवान के भक्त के रूप में हमारा जीवनमंत्र क्या और कैसा होना चाहिए उसकी दिशा हमें कहां थी ? इसलिए ही केवल कृपा करके दोनों दिव्य सत्पुरुषों द्वारा दिए गए इस जीवनमंत्र की नौ कलमों का आइए आचमन कर उस प्रकार अनुसरण करने के लिए कटिबद्ध बनें :
स्वामिनारायण भगवान मेरे इष्टदेव हैं ।
यह सत्संग मेरा घर है ।
महाराज की मूर्ति मेरा ध्येय है ।
सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं ।
महाराज के लिए ही मेरा जन्म है ।
उन्हीं के होकर ही सदा जीना है ।
भगवान और संत की सेवा ही मेरा सुख है ।
उनकी आज्ञा और अनुवृत्ति में ही सदा रहूंगा ।
प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में सदा भागीदार बनूंगा ।
यह जीवनमंत्र हमें मिली सर्वोपरी प्राप्ति का गौरवभान कराता है । श्रीजीमहाराज, सत्पुरुष, मंदिर, सत्संग सभा, संबंध वाले संतों-भक्तों के प्रति ममत्वभाव और अस्मिता की ज्योत प्रज्वलित करता है । हमारे जीवनध्येय का अनुसंधान दिलाता है । आत्यंतिक कल्याण हो ही गया है इसका पूर्णकामपना और कृतार्थपना दृढ़ कराता है । आज्ञा-अनुवृत्ति, सेवा-समर्पण और बलिदान की भावना जगाता है । संक्षेप में प्राप्ति से स्थिति तक पहुंचने का मार्गदर्शन देता है ।
यह जीवनमंत्र जिसने अपने जीवन में लक्ष्यार्थ किया है ऐसे भूतकाल और वर्तमान के प्रेरणादायी पात्रों के दर्शन कर जीवनमंत्र की नौ कलमों के अनुसार अनुसरण करने के लिए कृतनिश्चयी बनें यही अभिलाषा ।
जीवनमंत्र : एक आदर्श
एक राजा जंगल में घूमने निकले । परंतु जंगल से बाहर निकलने का रास्ता भूल गए । शाम हो गई । राजा को बहुत भूख लगी थी । दूर एक संन्यासी शिष्य की पर्णकुटीर देख भोजन की आशा से राजा ने अंदर प्रवेश किया । संन्यासी शिष्य ने राजा का आदरभाव से स्वागत किया । भोजन कराया । राजा ने उसे चंदन की बाड़ी भेंट में दी । संन्यासी शिष्य को चंदन के वृक्ष के विषय में विशेष कुछ ज्ञान नहीं था । इसलिए उसने चंदन की लकड़ियां काट कर बेचना शुरू कर दिया ।
एक-एक करके सारे ही वृक्षों की लकड़ियां बेच डालीं ।
एक दिन गुरु ने ज्ञानोपदेश में बात की कि, “वन-वन में अगर नहीं होता । जंगल में हजारों वृक्षों में एक चंदन वृक्ष होता है । जिसकी कीमत लाखों में होती है ।” गुरु की बात सुनकर संन्यासी शिष्य को पश्चात्ताप हुआ कि उसने तो पानी के भाव में चंदन की लकड़ियां बेचकर वाड़ी उजाड़ दी ।
शिष्य ने गुरु को बात की । शिष्य की नासमझी और पछतावा देखकर गुरु बोले, “वत्स, पश्चात्ताप मत कर । यह पूरी दुनिया तेरी तरह ही नासमझ है । जीवन का प्रत्येक क्षण बहुत ही कीमती है पर लोग उसे कौड़ी की कीमत पर गंवा देते
हैं ।”
कहानी से मिलने वाला बोध वास्तव में मर्ममय है । चंदन समान मनुष्य जीवन वास्तव में प्रभुभक्ति कर आत्यंतिक मोक्ष पाने के लिए है । परंतु अधिकांश मानव पैसा, पद, प्रतिष्ठा तथा विषयसुख प्राप्त करने के पीछे ही कीमती मनुष्य जीवन कौड़ी की कीमत पर गंवा देते हैं । यही उसका जीवनमंत्र बन गया होता है । और जब खुद ने की हुई भूल का अहसास होता है तब बहुत समय बीत चुका होता है ।
‘Eat, drink and be marry’ यानी कि ‘खाना, पीना और विषय भोगना’ यह जीवनमंत्र अपनाकर जीवन जीने वाला मानव, मानव के वेष में केवल पशु ही
है ।
उत्तम और महान व्यक्ति अपने जीवनरूपी रथ को किसी उच्चतम मूल्यों के साथ आगे हांकते होते हैं । उस जीवनमंत्र से ही महान व्यक्ति की महानता परखी जाती है ।
सत्य और अहिंसा को जीवन का मंत्र बनाकर भारत देश को आज़ादी दिलाने वाले महात्मा गांधी इन्हीं में से एक महान हस्ती थे ।
सिद्धांत में समाधान नहीं और नियम-धर्म में छूट नहीं - इस जीवनमंत्र को जीवन पर्यंत पकड़े रहकर हमारे सभी के जीवन में सिद्धांत और धर्म-नियम के अविचल खूंटे गाड़कर समग्र संप्रदाय में SMVS की एक अलग गुडविल खड़ी करने वाले युगपुरुष यानी हमारे गुरुदेव प.पू. बापजी ।
हम सभी को कार्य का बंधन तुड़वाकर कारण स्वरूप श्रीजीमहाराज की मूर्ति में जोड़ने का संकल्प लेकर इस ब्रह्मांड में पधारे दिव्य सत्पुरुष प्यारे गुरुजी प.पू. स्वामीश्री के जीवन में पल-पल एक जीवनमंत्र के दर्शन होते हैं – ‘अनंत को अनादि की स्थिति करानी ही है ।’
संक्षेप में, जीवनमंत्र यानी निर्धारित जीवन के ध्येय या हेतु को पूर्ण करने के लिए सहायक मूल्य या महत्त्वपूर्ण पहलू, गुणों । जिनके आनुषंगिक रहकर ही ध्येय पूर्ति का मिशन पार करना होता है ।
प्यारे गुरुदेव और प्यारे गुरुजी के योग-समागम से अब बुद्धिकक्षा पर, देह भूमिका पर इतना तो समझ आया है कि हमारा जीवनध्येय है – अवरभाव में महाराज और सत्पुरुष को राज़ी करना और परभाव में अनादि की स्थिति पाकर मूर्ति का सुख पाना । अब उसे लक्ष्यार्थ भूमिका पर ले जाने के लिए ही प्यारे गुरुदेव की आज्ञा-प्रेरणा से गुरुजी ने हमें एक अद्भुत जीवनमंत्र की भेंट दी है ।
जगत के देहधारी जीवों का जीवनमंत्र पैसा, पद, प्रतिष्ठा तथा पंचविषय में आसक्त होना ही है । उत्तम मानव का जीवनमंत्र प्रामाणिकता के मार्ग पर चलना है । जबकि भगवान के भक्त के रूप में हमारा जीवनमंत्र क्या और कैसा होना चाहिए उसकी दिशा हमें कहां थी ? इसलिए ही केवल कृपा करके दोनों दिव्य सत्पुरुषों द्वारा दिए गए इस जीवनमंत्र की नौ कलमों का आइए आचमन कर उस प्रकार अनुसरण करने के लिए कटिबद्ध बनें :
स्वामिनारायण भगवान मेरे इष्टदेव हैं ।
यह सत्संग मेरा घर है ।
महाराज की मूर्ति मेरा ध्येय है ।
सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं ।
महाराज के लिए ही मेरा जन्म है ।
उन्हीं के होकर ही सदा जीना है ।
भगवान और संत की सेवा ही मेरा सुख है ।
उनकी आज्ञा और अनुवृत्ति में ही सदा रहूंगा ।
प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में सदा भागीदार बनूंगा ।
यह जीवनमंत्र हमें मिली सर्वोपरी प्राप्ति का गौरवभान कराता है । श्रीजीमहाराज, सत्पुरुष, मंदिर, सत्संग सभा, संबंध वाले संतों-भक्तों के प्रति ममत्वभाव और अस्मिता की ज्योत प्रज्वलित करता है । हमारे जीवनध्येय का अनुसंधान दिलाता है । आत्यंतिक कल्याण हो ही गया है इसका पूर्णकामपना और कृतार्थपना दृढ़ कराता है । आज्ञा-अनुवृत्ति, सेवा-समर्पण और बलिदान की भावना जगाता है । संक्षेप में प्राप्ति से स्थिति तक पहुंचने का मार्गदर्शन देता है ।
यह जीवनमंत्र जिसने अपने जीवन में लक्ष्यार्थ किया है ऐसे भूतकाल और वर्तमान के प्रेरणादायी पात्रों के दर्शन कर जीवनमंत्र की नौ कलमों के अनुसार अनुसरण करने के लिए कृतनिश्चयी बनें यही अभिलाषा ।