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कलम

महाराज की मूर्ति मेरा ध्येय है

एक बार सद्. गुणातीतानंद स्वामी जूनागढ़ की गली से गुजर रहे थे । तब एक बच्चा गली में यहां-वहां दौड़-भाग कर रहा था । सद्गुरुश्री ने बच्चे को पास बुलाया और प्रेम से पूछा, “तू यह दौड़-भाग क्यों कर रहा है ?”

बच्चे ने उत्तर दिया, “बस, ऐसे ही ।”

क्या हम भी इस बच्चे जैसा ही नहीं करते ??

बहुत दौड़-भाग करके पैसा, धन, संपत्ति, वाह-वाह, यश, कीर्ति, सम्मान प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं । लेकिन साथ क्या आएगा ? इसमें से कुछ भी नहीं ।

परंतु जगत के जीवों के संग में यह सब प्राप्त करने का लक्ष्य बांध कर बैठे हैं इसलिए अति कीमती मनुष्य जन्म मिला, उसमें भी ऐसे सर्वोपरी भगवान स्वामिनारायण, जीवनप्राण बापाश्री और समर्थ गुरुदेव-गुरुजी की प्राप्ति हुई, फिर भी इस जीवात्मा के कल्याण के लिए महाराज और सत्पुरुष को राज़ी करना और सदेह मूर्तिसुख के भोक्ता होना, यह वास्तविक लक्ष्य भूल जाते हैं ।

सर्वप्रथम हम जीवन का यह लक्ष्य निश्चित कर लें कि मुझे महाराज और सत्पुरुष को इस बार राज़ी कर ही लेना है । राज़ीपा के बदले में मूर्तिसुख के अधिकारी होना ही है । यदि लक्ष्य निश्चित किया होगा तो उसे प्राप्त करने के लिए अथाह प्रयत्न
होंगे ।

संस्कृत भाषा के महान विद्वान पाणिनि की बात कहां अनजानी है ?

बचपन में एक ज्योतिषी मिले । बच्चे ने हाथ दिखाया और कहा, “मेरा भविष्य बताइए ।” बचपन से ही शरारती, खिलंदरा और ठोट छात्र के उपनाम को पाने वाले बालक पाणिनि का ज्योतिषी ने भविष्य बताया कि, “तेरे हाथ में विद्या रेखा ही नहीं है । तू अनपढ़ रहेगा और...”

तब पाणिनि ने दृढ़ संकल्प किया और लक्ष्य निश्चित किया कि, ‘बस, किसी भी कीमत पर मुझे पढ़ना ही है और महान पंडित-विद्वान बनना है ।’ और हाथ में चाकू लेकर दाहिने हाथ की हथेली में चीरा लगाकर विद्या रेखा बनाई और अथाह पुरुषार्थ किया । जिससे वे अपने लक्ष्य को पूरा कर सके और संस्कृत के एक महान विद्वान बने ।

हमें कोई दुनियावी बड़प्पन, मान या सिद्धि नहीं चाहिए, नहीं चाहिए कोई मेडल, शील्ड या पदक ।

परंतु केवल एक ही मूर्ति के सुख की प्यास हम सभी को है । तब गुरुदेव प.पू. बापजी और गुरुजी प.पू. स्वामीश्री ने हमें क्या लक्ष्य दिया ? महाराज की मूर्ति मेरा लक्ष्य है ।

इस लक्ष्य को पूर्ण करने का अभी श्रेष्ठ अवसर है । क्योंकि बापाश्री कहते थे कि, “यह जोग (दिव्य कारण सत्संग) मिला है वह अति दुर्लभ है । महाराज और सत्पुरुष जब प्रगट हो तब जो संकल्प करें वह सिद्ध होता ही है ।”

तब हमें महाराज की मूर्ति में जुड़ने का अपना लक्ष्य पूर्ण करने में लगे ही रहना चाहिए । महाराज की मूर्ति में जुड़ने का एकमात्र मार्ग यानी ध्यान । ध्यान से ही मूर्ति का साक्षात्कार होता है और उस सुख को पाया जाता है । बापाश्री ने तो ध्यान का बहुत ही महत्त्व बताया है । बापाश्री ने पहले भाग की १६७वीं बात में कहा है कि, “इस जोग में रहकर ध्यान करके मूर्ति सिद्ध नहीं करोगे तो महाराज के और सत्पुरुष के गुनहगार बनोगे ।” इसलिए हमें भी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए पुरुषोत्तमनारायण के दिव्य स्वरूप का सर्वप्रथम ज्ञान दृढ़ करके फिर हमें जो अनादिमुक्त की स्थिति की, मूर्ति में रहकर मूर्ति का ध्यान करने की बापाश्री ने लटक दी, उस प्रकार ध्यान करना चाहिए । ध्यान करते-करते कदाचित मूर्ति न दिखे तो भी ध्यान करते रहना । वह देखकर भी महाराज राज़ी होंगे और निश्चित ही पात्र बनाकर सुख प्रदान करेंगे । इस प्रकार, ध्यान का अति आग्रह रखकर महाराज का ध्यान करना ।

वागड देश के एक हरिभक्त थे । वे एक दिन भुज मंदिर के महंत सद्. श्री अक्षरजीवनदासजी स्वामी के पास आए । लगभग सत्तर वर्ष की आयु । इस उम्र में वैराग्य हुआ और मूर्ति सिद्ध करने की लगन लगी । स्वामी ने उनकी मुमुक्षुता और वैराग्य आदि शुभ गुण देखकर बहुत राज़ीपा दिखाया और उन्हें कसौटी की निहाई पर चढ़ाया (कसौटी लेना शुरू किया) ।

स्वामी ने तीन-तीन व्यक्तियों की सेवा अकेले उन्हें ही सौंपी, परंतु सेवा करते-करते थक जाएं वो वैसे नहीं । ध्यान करने का समय तो मिले ही कहां से ? लेकिन मूर्ति जिसका लक्ष्य था, ऐसे ये भक्त रात में सारी सेवा पूरी हो जाने के बाद अपने आसन पर आकर ध्यान करने बैठते और घंटों निकल जाते । ध्यान का इतना अधिक आग्रह कि कान में तेल के डिब्बे की कड़ियां फंसाकर डोरी बांधकर ध्यान में बैठते ताकि ध्यान में नींद न आए । स्वामी उनका आग्रह देखकर बहुत राज़ी हुए और साधु बनाकर दूसरी सभी सेवाओं से निवृत्ति दे दी । उन्होंने घंटों तक ध्यान करके अंततः मूर्ति सिद्ध की । कितना अधिक आग्रह !

गांव रोहा के दीवान कुंवरजीभाई बहुत ही विचक्षण बुद्धि वाले थे । अपने कल्याण के लिए सच्चे गुरु की खोज करते और कसौटी में जो पास होते उन्हें वे गुरु बनाते । दूसरे श्रेष्ठ मिलने पर पुराने और नए दोनों गुरुओं के बीच चर्चा करवाते और यदि नए गुरु जीत जाते तो पुराने गुरु को छोड़कर नए गुरु बना लेते । इस तरह उन्होंने अठारह गुरु किए थे ।

एक दिन हमारे समर्थ सद्. श्री ईश्वरचरणदासजी स्वामीश्री पधारे । स्वामीश्री का परभावी सामर्थ्य देखकर उन्हें स्वामीश्री में आकर्षण हुआ और सद्गुरुश्री को अपने गुरु के रूप में स्थापित करने के लिए पुराने गुरु के साथ चर्चा करने को कहा । सद्गुरुश्री ने कहा, “हम तो तैयार ही हैं । दिन निश्चित करो और आयोजन करो; हम जरूर आएंगे ।”

कुंवरजीभाई ने अपने पुराने गुरु से बात की लेकिन पुराने गुरु ने तो सद्गुरुश्री का परभावी सामर्थ्य जानकर चर्चा करने से ही मना कर दिया । इसलिए कुंवरजीभाई ने सद्गुरुश्री को अपने गुरु बनाएं ।

एक दिन कुंवरजीभाई ने सद्गुरुश्री से कहा, “स्वामी ! हमारे संप्रदाय के मुख्य शास्त्र कौन से हैं ?” सद्गुरुश्री ने कहा, “वचनामृत और शिक्षापत्री ।” तब कुंवरजीभाई ने कहा, “स्वामी, सभी वचनामृतों में से कौन सा एक वचनामृत दृढ़ करें और शिक्षापत्री के सभी श्लोकों में से कौन सा एक श्लोक दृढ़ करें तो सब कुछ पूरा हो जाए ?”

सद्गुरुश्री ने कहा, “२७३ वचनामृतों में से केवल एक अहमदाबाद प्रकरण का ७वां वचनामृत जिसमें भगवान के स्वरूप का ज्ञान है – हम ही पुरुषोत्तम हैं । और शिक्षापत्री के २१२ श्लोकों में से केवल एक ११६वां श्लोक जिसमें अपने स्वरूप का ज्ञान है ।

निजात्मानं ब्रह्मरुपं देहत्रयविलक्षणम् ।

विभाव्य तेन कर्तव्या भक्ति: श्रीहरि कृष्णस्य सर्वदा ।।

उन दोनों को दृढ़ करके आप ध्यान करो ।”

कुंवरजीभाई ने तो अपने और पुरुषोत्तमनारायण के स्वरूप के ज्ञान को लक्ष्यार्थ करने और मूर्ति रूपी लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए दृढ़ संकल्प करके पुरुषार्थ शुरू कर दिया ।

राज्य से एक महीने की छुट्टी ली और ध्यान करने लगे । शरीर भारी होने के कारण पालथी मारकर बैठने में भी सुविधा नहीं होती थी । फिर भी पालथी मारकर दोनों घुटनों पर चक्की के एक-एक पत्थर रखकर ध्यान करने बैठते और प्रतिदिन १०-१० घंटे ध्यान करते । एक महीने में पांच मिनट का निर्विकल्प ध्यान सिद्ध हुआ और भगवान के सुख का धीरे-धीरे अनुभव होने लगा और अब तो बस, मूर्ति सिद्ध करने की ऐसी लगन लगी कि दीवान पद से इस्तीफ़ा दे दिया और मूर्ति आकार वृत्ति करके मूर्ति में जुड़ने के लिए ध्यान करने लगे ।

ऐसे करते-करते बारह महीने बीत गए । एक दिन सद्गुरु पधारे और बात की, “स्वामी, आपकी कृपा से ढाई घंटे का निर्विकल्प ध्यान होता है तो कृपा करें ।” जब पूरे तीन घंटे निर्विकल्प ध्यान होता है तब स्थिति होती है, परंतु सद्गुरुश्री ने कहा, “चलिए, आपको फल दिला देते हैं ।” कुंवरजीभाई को अपने साथ लेकर सद्गुरुश्री वृषपुर पधारे । बापाश्री के दर्शन किए और बात की । बापाश्री कुंवरजीभाई पर बहुत राज़ी हुए और सिर पर हाथ रखते ही मूर्ति का साक्षात्कार करा दिया । अंततः अपना लक्ष्य जो मूर्ति सिद्ध करने रूपी शिखर था, उसे हासिल किया । तब हमें भी अपने मूर्ति रूपी लक्ष्य को हासिल करने के लिए और पात्र बनने के लिए ज्ञान, ध्यान और जागरूकता के साथ अभ्यास रूपी अथाह पुरुषार्थ करना चाहिए; महाराज और उनके मुक्तों के दर्शन, सेवा और समागम करके राज़ीपा लेना चाहिए ताकि सहज ही सहजानंद मिल जाए और सहज में सहजानंद का आनंद बर्ते ।


 

स्व-अध्ययन

  1. दिन में नौकरी, धंधा, व्यवसाय करते हुए मूर्ति ही मेरा लक्ष्य है ऐसा अनुसंधान रहता है ? 
  2. मूर्तिसुख प्राप्त करने के लिए पात्रता के भाग स्वरूप गुरुजी द्वारा दिए गए ज्ञान-ध्यान चिंतन प्रोजेक्ट का प्रतिदिन लाभ लिया जाता है ?
  3. हर घंटे निमग्न होने का अभ्यास होता है ?
  4. दिन में रोज़ आधा घंटा महाराज की मूर्ति का ध्यान होता है ?
  5. दिन के दौरान मूर्तिसुख के लिए ५०-१०० बार प्रार्थना होती है ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि,

अब भौतिक सुखों से पीछे हटकर एकमात्र महाराज की मूर्ति में जुड़ने रूपी लक्ष्य को मजबूत बनाना ही है ।

कलम

महाराज की मूर्ति मेरा ध्येय है

एक बार सद्. गुणातीतानंद स्वामी जूनागढ़ की गली से गुजर रहे थे । तब एक बच्चा गली में यहां-वहां दौड़-भाग कर रहा था । सद्गुरुश्री ने बच्चे को पास बुलाया और प्रेम से पूछा, “तू यह दौड़-भाग क्यों कर रहा है ?”

बच्चे ने उत्तर दिया, “बस, ऐसे ही ।”

क्या हम भी इस बच्चे जैसा ही नहीं करते ??

बहुत दौड़-भाग करके पैसा, धन, संपत्ति, वाह-वाह, यश, कीर्ति, सम्मान प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं । लेकिन साथ क्या आएगा ? इसमें से कुछ भी नहीं ।

परंतु जगत के जीवों के संग में यह सब प्राप्त करने का लक्ष्य बांध कर बैठे हैं इसलिए अति कीमती मनुष्य जन्म मिला, उसमें भी ऐसे सर्वोपरी भगवान स्वामिनारायण, जीवनप्राण बापाश्री और समर्थ गुरुदेव-गुरुजी की प्राप्ति हुई, फिर भी इस जीवात्मा के कल्याण के लिए महाराज और सत्पुरुष को राज़ी करना और सदेह मूर्तिसुख के भोक्ता होना, यह वास्तविक लक्ष्य भूल जाते हैं ।

सर्वप्रथम हम जीवन का यह लक्ष्य निश्चित कर लें कि मुझे महाराज और सत्पुरुष को इस बार राज़ी कर ही लेना है । राज़ीपा के बदले में मूर्तिसुख के अधिकारी होना ही है । यदि लक्ष्य निश्चित किया होगा तो उसे प्राप्त करने के लिए अथाह प्रयत्न
होंगे ।

संस्कृत भाषा के महान विद्वान पाणिनि की बात कहां अनजानी है ?

बचपन में एक ज्योतिषी मिले । बच्चे ने हाथ दिखाया और कहा, “मेरा भविष्य बताइए ।” बचपन से ही शरारती, खिलंदरा और ठोट छात्र के उपनाम को पाने वाले बालक पाणिनि का ज्योतिषी ने भविष्य बताया कि, “तेरे हाथ में विद्या रेखा ही नहीं है । तू अनपढ़ रहेगा और...”

तब पाणिनि ने दृढ़ संकल्प किया और लक्ष्य निश्चित किया कि, ‘बस, किसी भी कीमत पर मुझे पढ़ना ही है और महान पंडित-विद्वान बनना है ।’ और हाथ में चाकू लेकर दाहिने हाथ की हथेली में चीरा लगाकर विद्या रेखा बनाई और अथाह पुरुषार्थ किया । जिससे वे अपने लक्ष्य को पूरा कर सके और संस्कृत के एक महान विद्वान बने ।

हमें कोई दुनियावी बड़प्पन, मान या सिद्धि नहीं चाहिए, नहीं चाहिए कोई मेडल, शील्ड या पदक ।

परंतु केवल एक ही मूर्ति के सुख की प्यास हम सभी को है । तब गुरुदेव प.पू. बापजी और गुरुजी प.पू. स्वामीश्री ने हमें क्या लक्ष्य दिया ? महाराज की मूर्ति मेरा लक्ष्य है ।

इस लक्ष्य को पूर्ण करने का अभी श्रेष्ठ अवसर है । क्योंकि बापाश्री कहते थे कि, “यह जोग (दिव्य कारण सत्संग) मिला है वह अति दुर्लभ है । महाराज और सत्पुरुष जब प्रगट हो तब जो संकल्प करें वह सिद्ध होता ही है ।”

तब हमें महाराज की मूर्ति में जुड़ने का अपना लक्ष्य पूर्ण करने में लगे ही रहना चाहिए । महाराज की मूर्ति में जुड़ने का एकमात्र मार्ग यानी ध्यान । ध्यान से ही मूर्ति का साक्षात्कार होता है और उस सुख को पाया जाता है । बापाश्री ने तो ध्यान का बहुत ही महत्त्व बताया है । बापाश्री ने पहले भाग की १६७वीं बात में कहा है कि, “इस जोग में रहकर ध्यान करके मूर्ति सिद्ध नहीं करोगे तो महाराज के और सत्पुरुष के गुनहगार बनोगे ।” इसलिए हमें भी अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए पुरुषोत्तमनारायण के दिव्य स्वरूप का सर्वप्रथम ज्ञान दृढ़ करके फिर हमें जो अनादिमुक्त की स्थिति की, मूर्ति में रहकर मूर्ति का ध्यान करने की बापाश्री ने लटक दी, उस प्रकार ध्यान करना चाहिए । ध्यान करते-करते कदाचित मूर्ति न दिखे तो भी ध्यान करते रहना । वह देखकर भी महाराज राज़ी होंगे और निश्चित ही पात्र बनाकर सुख प्रदान करेंगे । इस प्रकार, ध्यान का अति आग्रह रखकर महाराज का ध्यान करना ।

वागड देश के एक हरिभक्त थे । वे एक दिन भुज मंदिर के महंत सद्. श्री अक्षरजीवनदासजी स्वामी के पास आए । लगभग सत्तर वर्ष की आयु । इस उम्र में वैराग्य हुआ और मूर्ति सिद्ध करने की लगन लगी । स्वामी ने उनकी मुमुक्षुता और वैराग्य आदि शुभ गुण देखकर बहुत राज़ीपा दिखाया और उन्हें कसौटी की निहाई पर चढ़ाया (कसौटी लेना शुरू किया) ।

स्वामी ने तीन-तीन व्यक्तियों की सेवा अकेले उन्हें ही सौंपी, परंतु सेवा करते-करते थक जाएं वो वैसे नहीं । ध्यान करने का समय तो मिले ही कहां से ? लेकिन मूर्ति जिसका लक्ष्य था, ऐसे ये भक्त रात में सारी सेवा पूरी हो जाने के बाद अपने आसन पर आकर ध्यान करने बैठते और घंटों निकल जाते । ध्यान का इतना अधिक आग्रह कि कान में तेल के डिब्बे की कड़ियां फंसाकर डोरी बांधकर ध्यान में बैठते ताकि ध्यान में नींद न आए । स्वामी उनका आग्रह देखकर बहुत राज़ी हुए और साधु बनाकर दूसरी सभी सेवाओं से निवृत्ति दे दी । उन्होंने घंटों तक ध्यान करके अंततः मूर्ति सिद्ध की । कितना अधिक आग्रह !

गांव रोहा के दीवान कुंवरजीभाई बहुत ही विचक्षण बुद्धि वाले थे । अपने कल्याण के लिए सच्चे गुरु की खोज करते और कसौटी में जो पास होते उन्हें वे गुरु बनाते । दूसरे श्रेष्ठ मिलने पर पुराने और नए दोनों गुरुओं के बीच चर्चा करवाते और यदि नए गुरु जीत जाते तो पुराने गुरु को छोड़कर नए गुरु बना लेते । इस तरह उन्होंने अठारह गुरु किए थे ।

एक दिन हमारे समर्थ सद्. श्री ईश्वरचरणदासजी स्वामीश्री पधारे । स्वामीश्री का परभावी सामर्थ्य देखकर उन्हें स्वामीश्री में आकर्षण हुआ और सद्गुरुश्री को अपने गुरु के रूप में स्थापित करने के लिए पुराने गुरु के साथ चर्चा करने को कहा । सद्गुरुश्री ने कहा, “हम तो तैयार ही हैं । दिन निश्चित करो और आयोजन करो; हम जरूर आएंगे ।”

कुंवरजीभाई ने अपने पुराने गुरु से बात की लेकिन पुराने गुरु ने तो सद्गुरुश्री का परभावी सामर्थ्य जानकर चर्चा करने से ही मना कर दिया । इसलिए कुंवरजीभाई ने सद्गुरुश्री को अपने गुरु बनाएं ।

एक दिन कुंवरजीभाई ने सद्गुरुश्री से कहा, “स्वामी ! हमारे संप्रदाय के मुख्य शास्त्र कौन से हैं ?” सद्गुरुश्री ने कहा, “वचनामृत और शिक्षापत्री ।” तब कुंवरजीभाई ने कहा, “स्वामी, सभी वचनामृतों में से कौन सा एक वचनामृत दृढ़ करें और शिक्षापत्री के सभी श्लोकों में से कौन सा एक श्लोक दृढ़ करें तो सब कुछ पूरा हो जाए ?”

सद्गुरुश्री ने कहा, “२७३ वचनामृतों में से केवल एक अहमदाबाद प्रकरण का ७वां वचनामृत जिसमें भगवान के स्वरूप का ज्ञान है – हम ही पुरुषोत्तम हैं । और शिक्षापत्री के २१२ श्लोकों में से केवल एक ११६वां श्लोक जिसमें अपने स्वरूप का ज्ञान है ।

निजात्मानं ब्रह्मरुपं देहत्रयविलक्षणम् ।

विभाव्य तेन कर्तव्या भक्ति: श्रीहरि कृष्णस्य सर्वदा ।।

उन दोनों को दृढ़ करके आप ध्यान करो ।”

कुंवरजीभाई ने तो अपने और पुरुषोत्तमनारायण के स्वरूप के ज्ञान को लक्ष्यार्थ करने और मूर्ति रूपी लक्ष्य को सिद्ध करने के लिए दृढ़ संकल्प करके पुरुषार्थ शुरू कर दिया ।

राज्य से एक महीने की छुट्टी ली और ध्यान करने लगे । शरीर भारी होने के कारण पालथी मारकर बैठने में भी सुविधा नहीं होती थी । फिर भी पालथी मारकर दोनों घुटनों पर चक्की के एक-एक पत्थर रखकर ध्यान करने बैठते और प्रतिदिन १०-१० घंटे ध्यान करते । एक महीने में पांच मिनट का निर्विकल्प ध्यान सिद्ध हुआ और भगवान के सुख का धीरे-धीरे अनुभव होने लगा और अब तो बस, मूर्ति सिद्ध करने की ऐसी लगन लगी कि दीवान पद से इस्तीफ़ा दे दिया और मूर्ति आकार वृत्ति करके मूर्ति में जुड़ने के लिए ध्यान करने लगे ।

ऐसे करते-करते बारह महीने बीत गए । एक दिन सद्गुरु पधारे और बात की, “स्वामी, आपकी कृपा से ढाई घंटे का निर्विकल्प ध्यान होता है तो कृपा करें ।” जब पूरे तीन घंटे निर्विकल्प ध्यान होता है तब स्थिति होती है, परंतु सद्गुरुश्री ने कहा, “चलिए, आपको फल दिला देते हैं ।” कुंवरजीभाई को अपने साथ लेकर सद्गुरुश्री वृषपुर पधारे । बापाश्री के दर्शन किए और बात की । बापाश्री कुंवरजीभाई पर बहुत राज़ी हुए और सिर पर हाथ रखते ही मूर्ति का साक्षात्कार करा दिया । अंततः अपना लक्ष्य जो मूर्ति सिद्ध करने रूपी शिखर था, उसे हासिल किया । तब हमें भी अपने मूर्ति रूपी लक्ष्य को हासिल करने के लिए और पात्र बनने के लिए ज्ञान, ध्यान और जागरूकता के साथ अभ्यास रूपी अथाह पुरुषार्थ करना चाहिए; महाराज और उनके मुक्तों के दर्शन, सेवा और समागम करके राज़ीपा लेना चाहिए ताकि सहज ही सहजानंद मिल जाए और सहज में सहजानंद का आनंद बर्ते ।


 

स्व-अध्ययन

  1. दिन में नौकरी, धंधा, व्यवसाय करते हुए मूर्ति ही मेरा लक्ष्य है ऐसा अनुसंधान रहता है ? 
  2. मूर्तिसुख प्राप्त करने के लिए पात्रता के भाग स्वरूप गुरुजी द्वारा दिए गए ज्ञान-ध्यान चिंतन प्रोजेक्ट का प्रतिदिन लाभ लिया जाता है ?
  3. हर घंटे निमग्न होने का अभ्यास होता है ?
  4. दिन में रोज़ आधा घंटा महाराज की मूर्ति का ध्यान होता है ?
  5. दिन के दौरान मूर्तिसुख के लिए ५०-१०० बार प्रार्थना होती है ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि,

अब भौतिक सुखों से पीछे हटकर एकमात्र महाराज की मूर्ति में जुड़ने रूपी लक्ष्य को मजबूत बनाना ही है ।