कलम ९
प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में सदा भागीदार बनूंगा
मानव परस्पर एक-दूसरे के सुख-दु:ख में मददगार हो वह मानवता है । परंतु भगवान के भक्त के सुख-दु:ख में भागीदार बना जाए और समय आने पर उनको मददगार बना जाए वह भक्तपद की चरमसीमा है ।
दादाखाचर की अमरेली के बाबाजी की सेना से रक्षा की ।
मांगरोल के आणंदजी संघाडिया का व्यवहार सुधारा ।
एक बार बारिश और चक्रवात से गिर गए एक हरिभक्त के घर की बल्ली (मोभ) श्रीहरि ने अपने कंधे पर उठाकर उनके पशु-धन और संपत्ति की रक्षा की थी । इस प्रकार, भगवान स्वामिनारायण स्वयं भी सत्संगी बंधुओं के सुख-दु:ख में तत्परता से हाजिर रहते थे ।
श्रीजीमहाराज का यह सिद्धांत था कि, ‘प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में भागीदार होना ।’ गुरुदेव प.पू. बापजी और गुरुजी प.पू. स्वामीश्री ने इसे जीवनमंत्र के स्वरूप में हमें दिया है ।
जिसे गढ़डा अंत्य प्रकरण के ७वें वचनामृत के दिव्य शब्दों द्वारा जानें : “हमारे अंतर का जो सिद्धांत है वह कहते हैं कि, जिसे अपने कल्याण की चाहना हो उसे तो भगवान और भगवान के साधु के सिवा दूसरा कुछ जगत में सुखदायी नहीं है । इसलिए जैसे अपने शरीर के प्रति जीव को आत्मबुद्धि बर्तती है, वैसी भगवान और भगवान के संत के प्रति आत्मबुद्धि रखनी चाहिए और भगवान के भक्त का पक्ष दृढ़ करके रखना चाहिए, और वह पक्ष रखते हुए आबरू बढ़े अथवा घटे अथवा मान हो या अपमान हो अथवा देह जीवित रहे या मरे पर किसी भी तरह से भगवान और भगवान के भक्त का पक्ष छोड़ना नहीं, और उनका अभाव आने देना नहीं, और भगवान के भक्त जैसे देह और देह के सगे-संबंधियों को प्रिय नहीं रखना, ऐसी रीति से जो हरिभक्त बर्तता है उसे अति बलवान ऐसे जो काम-क्रोधादिक शत्रु हैं वे भी पराजित नहीं कर सकते ।”
मांगरोल के करमशी भक्त की सेवा करने के लिए जीणाभाई पंचाला ले आए थे । खूब लगन से अपने आत्मीयजन (परिवार के सदस्य) जानकर जीणाभाई स्वयं उनकी सेवा करते थे । एक बार करमशी भक्त का सिर बहुत दु:ख रहा था । उन्होंने जीणाभाई से जरा बात की । जीणाभाई ने अपनी बहन अदीबा से कहा कि, “बहन, घर में सोंठ और मिर्च (काली मिर्च) हो तो पीसकर ले आओ तो करमशी भक्त के माथे पर लगाएं ।” अदीबा को थोड़ा संकल्प हुआ कि, ‘इन पराये की भला इतनी क्या सेवा ? कितने दिनों से सेवा कर रहे हैं !’ और ऐसे विचार से घर में जाकर थोड़ी देर रहकर वापस आएं और कहा, “भाई, मैंने घर में देखा पर... काली मिर्च तो नहीं दिख रही हैं । खत्म हो गई लगती हैं ।”
जीणाभाई को बहन के इस जवाब में कुछ अजीब लगा और शंका हुई । पर फिर भी उस समय तो उन्होंने सुन लिया ।
दूसरे दिन सुबह से ही जीणाभाई जानबूझकर बेचैन बन गए और थोड़ी देर सो गए । अदीबा ने आकर भाई के स्वास्थ्य के समाचार पूछे । तब उदास मुंह करके जीणाभाई बोले, “बहन, आज तो सुबह से सिर बहुत दु:ख रहा है । यदि सोंठ और काली मिर्च होती तो लगाता ।”
और थोड़ी देर में अदीबा घर में जाकर सोंठ-काली मिर्च पीसकर, कटोरा भरकर जीणाभाई को लगाने के लिए ले आएं ।
जीणाभाई, जिनके हृदय में भगवान के भक्त की सेवा देह और देह के सगे-संबंधियों से भी अधिक थी वे यह कैसे सह सकते थे ? उन्होंने कटोरा फेंक दिया और बोल उठे, “बहन, कल करमशी भक्त की सेवा में सोंठ-काली मिर्च नहीं थी और आज कहां से आई ? महाराज के भक्त के प्रति में यदि तुम्हारे मन में अपनेपन की भावना न हो और उनकी सेवा बेगार लगती हो तो जाओ, आज के बाद मैं तुम्हारा मुंह नहीं देखूंगा ।” कैसा भगवान के भक्त के प्रति प्रेम ! और सचमुच जीणाभाई ने भक्त का पक्ष रखने के लिए १८-१८ वर्षों तक अपनी सगी बहन का मुंह भी नहीं देखा । इसे कहते हैं भगवान का सच्चा भक्त ! जिन्होंने देह के संबंधी से अधिक स्नेह भगवान के भक्त के साथ जोड़ा था ।
एक बार हळवद के धनजीभाई का इकलौता बेटा ओधवजी बीमार पड़ा । और बीमारी बहुत बढ़ गई । दूसरी ओर मालणियाद गांव के पास के अंजार गांव के श्रीजीमहाराज के अनन्य आश्रित श्री भाईचंदभाई का इकलौता बेटा तलकशी भी बहुत बीमार था । इस प्रकार दोनों बेटे अंतिम घड़ी में (देह त्यागने की तैयारी में) थे । अंजार वाले भाईचंदभाई का आदमी हळवद धनजीभाई को तलकशीभाई की दवा करने के लिए बुलाने आया । इस तरफ बेटा ओधवजी अंतिम घड़ी गीन रहा है और दूसरी तरफ सत्संगी का बेटा देह त्यागने की तैयारी में है । ऐसे समय में क्या करें ? अपने बेटे की सेवा में रहें या महाराज के अनन्य आश्रित ऐसे भाईचंदभाई के बेटे तलकशी की सेवा करने जाएं ? क्या ऐसे प्रश्नों की झड़ी धनजीभाई को उलझा सकी या नहीं ? नहीं... नहीं..!
धनजीभाई तुरंत तैयार हो गए । धनजीभाई के पिता सुंदरजीभाई ने धनजीभाई से कहा, “अरे धनजी, यह तेरा बेटा अंतिम घड़ी में है और तू वहां जाएगा ?” धनजीभाई ने कहा, “पिताजी, पहले सत्संग का पक्ष, फिर संबंधी का । यदि मैं न जाऊं तो भाईचंदभाई का चने का खेत नष्ट हो जाए (अर्थात् उनका इकलौता बेटा है वह धाम में चला जाए) वह ठीक नहीं । ओधवजी का तो महाराज की जो इच्छा होगी वैसा होगा ।” उनके पिता ने कहा, “अरे, पर तेरा भी तो इकलौता ही है । तेरा कहां ज्वार का खेत था ? चने का ही है न ?” अर्थात् तेरा भी इकलौता ही बेटा है और वह भी देह त्यागने की तैयारी में है ।
फिर भी जिन्होंने सत्संग को जीवन माना है, भगवान और भगवान के संतों-भक्तों को ही सच्चा संबंधी माना है । उनके सुख में सुखी और दु:ख में दु:खी थे, उन्हें जगत की या देह-देह के संबंधी की प्रधानता हो सकती है क्या ?
और धनजीभाई अंजार गए । फिर तो बापाश्री ने दोनों के बेटों को दर्शन दिए और कहा कि, “तुम दोनों की आयु समाप्त हो चुकी है । पर इस धनजीभाई ने सत्संग का पक्ष रखा इसलिए हमें दोनों को रखना है ।” इस तरह दोनों को बापाश्री ने कृपा करके सत्संग की सेवा करने के लिए रखा । इसी का नाम है प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में सदा भागीदार होने की भावना । धन्य हैं ऐसे प्ररणामूर्ति समान भक्तों को !
इस प्रकार, इस लोक-परलोक में सदा सुखी रहने के लिए भगवान के भक्त के सुख-दु:ख में सदा भागीदार बने रहना । समय आने पर उनके साथ खड़े रहना । उनकी चिंता रखना तो महाराज बहुत राज़ी होते हैं ।
स्व-अध्ययन
दृढ़ संकल्प करें कि,
जीवन के अंतिम श्वास तक सत्संगी बंधुओं के सुख-दु:ख में भागीदार बनकर ही रहना है ।
कलम ९
प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में सदा भागीदार बनूंगा
मानव परस्पर एक-दूसरे के सुख-दु:ख में मददगार हो वह मानवता है । परंतु भगवान के भक्त के सुख-दु:ख में भागीदार बना जाए और समय आने पर उनको मददगार बना जाए वह भक्तपद की चरमसीमा है ।
दादाखाचर की अमरेली के बाबाजी की सेना से रक्षा की ।
मांगरोल के आणंदजी संघाडिया का व्यवहार सुधारा ।
एक बार बारिश और चक्रवात से गिर गए एक हरिभक्त के घर की बल्ली (मोभ) श्रीहरि ने अपने कंधे पर उठाकर उनके पशु-धन और संपत्ति की रक्षा की थी । इस प्रकार, भगवान स्वामिनारायण स्वयं भी सत्संगी बंधुओं के सुख-दु:ख में तत्परता से हाजिर रहते थे ।
श्रीजीमहाराज का यह सिद्धांत था कि, ‘प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में भागीदार होना ।’ गुरुदेव प.पू. बापजी और गुरुजी प.पू. स्वामीश्री ने इसे जीवनमंत्र के स्वरूप में हमें दिया है ।
जिसे गढ़डा अंत्य प्रकरण के ७वें वचनामृत के दिव्य शब्दों द्वारा जानें : “हमारे अंतर का जो सिद्धांत है वह कहते हैं कि, जिसे अपने कल्याण की चाहना हो उसे तो भगवान और भगवान के साधु के सिवा दूसरा कुछ जगत में सुखदायी नहीं है । इसलिए जैसे अपने शरीर के प्रति जीव को आत्मबुद्धि बर्तती है, वैसी भगवान और भगवान के संत के प्रति आत्मबुद्धि रखनी चाहिए और भगवान के भक्त का पक्ष दृढ़ करके रखना चाहिए, और वह पक्ष रखते हुए आबरू बढ़े अथवा घटे अथवा मान हो या अपमान हो अथवा देह जीवित रहे या मरे पर किसी भी तरह से भगवान और भगवान के भक्त का पक्ष छोड़ना नहीं, और उनका अभाव आने देना नहीं, और भगवान के भक्त जैसे देह और देह के सगे-संबंधियों को प्रिय नहीं रखना, ऐसी रीति से जो हरिभक्त बर्तता है उसे अति बलवान ऐसे जो काम-क्रोधादिक शत्रु हैं वे भी पराजित नहीं कर सकते ।”
मांगरोल के करमशी भक्त की सेवा करने के लिए जीणाभाई पंचाला ले आए थे । खूब लगन से अपने आत्मीयजन (परिवार के सदस्य) जानकर जीणाभाई स्वयं उनकी सेवा करते थे । एक बार करमशी भक्त का सिर बहुत दु:ख रहा था । उन्होंने जीणाभाई से जरा बात की । जीणाभाई ने अपनी बहन अदीबा से कहा कि, “बहन, घर में सोंठ और मिर्च (काली मिर्च) हो तो पीसकर ले आओ तो करमशी भक्त के माथे पर लगाएं ।” अदीबा को थोड़ा संकल्प हुआ कि, ‘इन पराये की भला इतनी क्या सेवा ? कितने दिनों से सेवा कर रहे हैं !’ और ऐसे विचार से घर में जाकर थोड़ी देर रहकर वापस आएं और कहा, “भाई, मैंने घर में देखा पर... काली मिर्च तो नहीं दिख रही हैं । खत्म हो गई लगती हैं ।”
जीणाभाई को बहन के इस जवाब में कुछ अजीब लगा और शंका हुई । पर फिर भी उस समय तो उन्होंने सुन लिया ।
दूसरे दिन सुबह से ही जीणाभाई जानबूझकर बेचैन बन गए और थोड़ी देर सो गए । अदीबा ने आकर भाई के स्वास्थ्य के समाचार पूछे । तब उदास मुंह करके जीणाभाई बोले, “बहन, आज तो सुबह से सिर बहुत दु:ख रहा है । यदि सोंठ और काली मिर्च होती तो लगाता ।”
और थोड़ी देर में अदीबा घर में जाकर सोंठ-काली मिर्च पीसकर, कटोरा भरकर जीणाभाई को लगाने के लिए ले आएं ।
जीणाभाई, जिनके हृदय में भगवान के भक्त की सेवा देह और देह के सगे-संबंधियों से भी अधिक थी वे यह कैसे सह सकते थे ? उन्होंने कटोरा फेंक दिया और बोल उठे, “बहन, कल करमशी भक्त की सेवा में सोंठ-काली मिर्च नहीं थी और आज कहां से आई ? महाराज के भक्त के प्रति में यदि तुम्हारे मन में अपनेपन की भावना न हो और उनकी सेवा बेगार लगती हो तो जाओ, आज के बाद मैं तुम्हारा मुंह नहीं देखूंगा ।” कैसा भगवान के भक्त के प्रति प्रेम ! और सचमुच जीणाभाई ने भक्त का पक्ष रखने के लिए १८-१८ वर्षों तक अपनी सगी बहन का मुंह भी नहीं देखा । इसे कहते हैं भगवान का सच्चा भक्त ! जिन्होंने देह के संबंधी से अधिक स्नेह भगवान के भक्त के साथ जोड़ा था ।
एक बार हळवद के धनजीभाई का इकलौता बेटा ओधवजी बीमार पड़ा । और बीमारी बहुत बढ़ गई । दूसरी ओर मालणियाद गांव के पास के अंजार गांव के श्रीजीमहाराज के अनन्य आश्रित श्री भाईचंदभाई का इकलौता बेटा तलकशी भी बहुत बीमार था । इस प्रकार दोनों बेटे अंतिम घड़ी में (देह त्यागने की तैयारी में) थे । अंजार वाले भाईचंदभाई का आदमी हळवद धनजीभाई को तलकशीभाई की दवा करने के लिए बुलाने आया । इस तरफ बेटा ओधवजी अंतिम घड़ी गीन रहा है और दूसरी तरफ सत्संगी का बेटा देह त्यागने की तैयारी में है । ऐसे समय में क्या करें ? अपने बेटे की सेवा में रहें या महाराज के अनन्य आश्रित ऐसे भाईचंदभाई के बेटे तलकशी की सेवा करने जाएं ? क्या ऐसे प्रश्नों की झड़ी धनजीभाई को उलझा सकी या नहीं ? नहीं... नहीं..!
धनजीभाई तुरंत तैयार हो गए । धनजीभाई के पिता सुंदरजीभाई ने धनजीभाई से कहा, “अरे धनजी, यह तेरा बेटा अंतिम घड़ी में है और तू वहां जाएगा ?” धनजीभाई ने कहा, “पिताजी, पहले सत्संग का पक्ष, फिर संबंधी का । यदि मैं न जाऊं तो भाईचंदभाई का चने का खेत नष्ट हो जाए (अर्थात् उनका इकलौता बेटा है वह धाम में चला जाए) वह ठीक नहीं । ओधवजी का तो महाराज की जो इच्छा होगी वैसा होगा ।” उनके पिता ने कहा, “अरे, पर तेरा भी तो इकलौता ही है । तेरा कहां ज्वार का खेत था ? चने का ही है न ?” अर्थात् तेरा भी इकलौता ही बेटा है और वह भी देह त्यागने की तैयारी में है ।
फिर भी जिन्होंने सत्संग को जीवन माना है, भगवान और भगवान के संतों-भक्तों को ही सच्चा संबंधी माना है । उनके सुख में सुखी और दु:ख में दु:खी थे, उन्हें जगत की या देह-देह के संबंधी की प्रधानता हो सकती है क्या ?
और धनजीभाई अंजार गए । फिर तो बापाश्री ने दोनों के बेटों को दर्शन दिए और कहा कि, “तुम दोनों की आयु समाप्त हो चुकी है । पर इस धनजीभाई ने सत्संग का पक्ष रखा इसलिए हमें दोनों को रखना है ।” इस तरह दोनों को बापाश्री ने कृपा करके सत्संग की सेवा करने के लिए रखा । इसी का नाम है प्रत्येक सत्संगी के सुख-दु:ख में सदा भागीदार होने की भावना । धन्य हैं ऐसे प्ररणामूर्ति समान भक्तों को !
इस प्रकार, इस लोक-परलोक में सदा सुखी रहने के लिए भगवान के भक्त के सुख-दु:ख में सदा भागीदार बने रहना । समय आने पर उनके साथ खड़े रहना । उनकी चिंता रखना तो महाराज बहुत राज़ी होते हैं ।
स्व-अध्ययन
दृढ़ संकल्प करें कि,
जीवन के अंतिम श्वास तक सत्संगी बंधुओं के सुख-दु:ख में भागीदार बनकर ही रहना है ।