SMVS
\

कलम

यह सत्संग मेरा घर है

घर शब्द ममत्वभाव से भरा है । इसीलिए कहा गया है कि, ‘पृथ्वी का छोर
घर ।‘ मनुष्य दुनिया के छोर तक जाए परंतु घर आने पर ही शांति होती है । तथापि, घर शब्द मात्र मिट्टी, लकड़ी या ईंट-सीमेंट के मकान के साथ ही जुड़ा नहीं है । उसमें रहने वाले सदस्यों के प्रति स्नेह इस शब्द में समाया हुआ है ।

प्यारे गुरुजी जीवनमंत्र की इस द्वितीय कलम द्वारा हमें ऐसा ही स्नेह सत्संग अर्थात् मंदिर, संतों और हरिभक्तों के साथ करने का सुझाव दे रहे हैं ।

‘यह सत्संग मेरा घर है’ ऐसा तो हम सब बोलते हैं परंतु समय आने पर सत्संग और सत्संगी बंधुओं के लिए घर-परिवार जैसा ममत्वभाव नहीं रख पाते । जिसे सत्संग घर माना गया हो, भगवान, सत्पुरुष, संत-भक्त सच्चे सगे माने गए हों उसका मंदिर और संतों-भक्तों के प्रति ममत्वभाव कैसा होता है ? वह कुछ प्रसंगों द्वारा देखते हैं ।

जब गढपुर मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था तब राजगीर ने आवाज लगाई कि, “गूगल गलाने के लिए एक खटिया चाहिए ।” परंतु किसी ने उनकी आवाज नहीं सुनी । इस कारण स्वयं श्रीजीमहाराज खड़े हुए । लाडूबा के कमरे में गए और वहां से खटिया लेकर बाहर निकले । वहां ही लाडूबा की सेविका यह दृश्य देख गई । उसने महाराज के हाथ से खटिया खींच लेने के लिए दूसरे छोर से खटिया पकड़ ली । महाराज और सेविका के बीच आपस में बहुत खींचतान हुई । परंतु महाराज ने युक्ति से खटिया छोड़ दी और सेविका खटिया के साथ नीचे गिर गई । फिर महाराज जल्दी से खटिया लेकर वहां से निकल गए । इस बात की जानकारी लाडुबा-जीवुबा को हुई इसलिए लाडुबा सेविका को डांटकर विदा करने लगे : “जा, अब तेरा मुझे कोई काम नहीं है । तूने महाराज के साथ झगड़ा किया ?” तब महाराज ने कहा, “लाडुबा, उसे निकालिए नहीं, घर में ऐसा ममत्व वाला मनुष्य तो एक चाहिए; तभी वस्तु सुरक्षित रहती है ।”

लाडुबा की सेविका की तरह हमने भी यदि सत्संग यानी मंदिर को अपना घर माना हो तो ऐसे ही ममत्वभाव से मंदिर की सेवा होगी । संतों-भक्तों को सच्चे सगे माना जाए । उनकी सेवा भी सच्चे ममत्वभाव से होगी । जैसे घर के सदस्यों की चिंता हमारी हो जाती है वैसे ही संतों-भक्तों की चिंता भी हमारी हो जाती है ।

गांव समढियाला का मंदिर बन रहा था । मंदिर की चारों तरफ की दीवार तो जैसे-तैसे खड़ी हुई । लेकिन ऊपर खपरैल (नळिया) डालना बाकी था और बारीश का मौसम था । बारिश का बहुत डर था । इसलिए सद्. वज्रानंद स्वामी को चिंता हुई कि, ‘मंदिर पर डालने के लिए खपरैल नहीं हैं । खपरैल कहीं मिल नहीं रहे
हैं । और यदि बारिश टूट पड़े और चक्रवात या तूफान आए तो मुश्किल से खड़ी की गई दीवारें भी गिर पड़ेगी ।’

स्वामी ने सभी सत्संगियों को बुलाकर बात की कि, “अब क्या करेंगे ?” तब कोई बोल नहीं सका लेकिन टींबी गांव के वीरा भगत ने स्वामी से कहा, “स्वामी, आप बैल गाड़ी भेजें । एक जगह खपरैल ध्यान में हैं तो मैं गाड़ी में रखवा देता हूं ।” स्वामी ने पूछा, “कहां हैं ?” वीरा भगत ने कहा, “स्वामी, आप चिंता न करें; एक जगह हैं । आप बैल गाड़ी मेरे साथ भेजें ।”

वीरा भगत तो निकले गाड़ी वाले को लेकर और गाड़ी ले जाकर अपने घर पर खड़ी की । खुद अपने छप्पर पर चढ़ गए और गाड़ी वाले से कहा, “भाई, मैं खपरैल देता हूं वह तू गाड़ी में रखना शुरू कर ।”

गाड़ी वाला तो एकदम दंग रह गया । क्योंकि उसे तो आश्चर्य ही लगा कि बारीश के मौसम में अपने घर के ऊपर से खपरैल लेकर मंदिर के लिए दे देना !! ऐसे काम किए जाते हैं ! यह देख साधु ने कहा, “अरे वीरा भगत, यह क्या कर रहे हो ? अपने घर से खपरैल उतारकर मंदिर में दे रहे हो ? लेकिन आपके घर का क्या होगा उसका विचार नहीं आता ? भगत, ऐसा पागलपन नहीं किया जाता ।”

वीरा भगत ने कहा, “स्वामी, यह तो मेरे देह का घर है । मंदिर तो मेरे महाराज और संतों के रहने का घर है । इस घर का जो होना होगा वह होगा लेकिन पहला घर मंदिर । मंदिर में भगवान और संत खपरैल के बिना चिंता करते हों और मैं इन खपरैल के नीचे कैसे रह सकता हूं ?? पहला मेरा मंदिर । इसलिए जल्दी ये खपरैल गाड़ी में रखना शुरू ही कर दो ।” कहते हुए सभी खपरैल लेकर गाड़ी भर दी और मंदिर पहुंचा दी ।

“महाराज मेरे बापा मेरे, गुरुजी मेरे न्यारे,

संत और मंदिर भी मेरा, सभा कभी न टालूं ।”

किशोर गीत की यह पंक्ति तो बार-बार हम बोले होंगे । आनंद में आकर ताली बजाकर झूमे भी होंगे । लेकिन वीरा भगत ने इन शब्दों को चरितार्थ किया था ।

एक बार श्रीजीमहाराज गढपुर में सभा भरकर विराजमान थे । वहां गढाळी के आंबा सेठ गाड़ी में खजूर और घी के मटके भरकर आए । इतनी सारी खजूर और घी देखकर महाराज ने पूछा, “क्यों सेठ, इतनी सारी खजूर और घी यहां लाए ?” सेठ ने विचार किया, ‘यदि सीधे तरीके से कह दूंगा कि आपको, संतों को और हरिभक्तों को खिलाने के लिए तो महाराज नाराज होंगे ।’ इसलिए सेठ ने युक्ति की, “महाराज, यहां व्यापार करने लाया हूं ।” महाराज ने कहा, “व्यापार... और
यहां ?”

सेठ ने कहा, “हां तो महाराज ! जहां मुनाफा ज्यादा और तुरंत मिले वहीं व्यापार किया जाता है न ! यहां आप, संत और हरिभक्त मेरी आत्मा के सच्चे सगे हो । आपको खिलाऊं तो आपका बहुत राज़ीपा होगा । आपका राज़ीपा ही मेरी सच्ची कमाई है । इसलिए मैं खजूर-घी की गाड़ी यहां ले आया ।” सेठ के ममत्वभाव भरे वचन सुनकर महाराज बहुत राज़ी हुए ।

नई सीजन शुरू होती है तब कोई भी वस्तु घर में लाते ही क्या हमें आंबा सेठ जैसा विचार आता है ?? हमारा जो जवाब आएगा वही हमारे ममत्वभाव की कसौटी होगी !!

वर्तमान समय में आंबा सेठ जैसे पात्रों पर प्यारे गुरुदेव और गुरुजी कईं बार राज़ीपा दर्शाते हैं । उनमें से एक दिव्य पात्र के दर्शन करते हैं । ई.स. १९८७ में वासणा मंदिर बनने के बाद संस्था में पू. संतों के लिए सीधा सामान (राशन) प.भ. श्री कांतिभाई तथा जशुभाई भावसार की किराने की दुकान से लाया जाता था । लेकिन वे उसका कभी बिल नहीं देते थे । गुरुजी हर महीने बिल मांगते थे । तीन महीने तक बिल नहीं दिया । फिर गुरुजी ने कड़क होकर कहा कि, “बिल नहीं दोगे तो तुम्हारे यहां से सामान नहीं लेंगे ।” फिर जशुभाई ने आंखों में आंसू के साथ कहा, “दयालु, मैं अपने परिवार में हर महीने १२ सदस्यों को सीधा देता हूं; कभी उनका बिल नहीं लेता । वैसे ही यह मंदिर भी मेरा घर है । ये आठ संत भी मेरे परिवार के सदस्य ही हैं । इसलिए मेरा वास्तव में २० सदस्यों का परिवार है । इसलिए इन सदस्यों का बिल कैसे लूं ?” इसे कहते हैं सत्संग मेरा घर । सत्संग में संत हमें नि:स्वार्थ भाव से दिव्यजीवन प्रदान करते हैं । इस ऋण को चुकाने के लिए हम भी उनके प्रति ऐसा ममत्वभाव विकसित करें ।

ई.स. १९८६-८७ में वासणा मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था । प्यारे गुरुजी ने एक हरिभक्त से कहा, “भाई, ज़रा पानी छिड़कने की इतनी सेवा करेंगे ?” तब उस हरिभक्त ने कहा, “स्वामी, मेरी तरफ देखकर तो सेवा दीजिए । मेरा दो मंजिल का मकान बना लेकिन मैंने अपने घर को कभी पानी नहीं छिड़का ।” अगर सत्संग को घर माना हो तो क्या ऐसे शब्द निकलेंगे ??

इस प्रकार, सत्संग मेरा घर है – ऐसी समझ दृढ़ हुई हो तो मंदिर की, संतों-भक्तों की सेवा बहुत ममत्वभाव से होती है । अन्यथा सेवा वह सेवा नहीं बल्कि बेगार (बोझ) लगती है, भाररूप लगती है, आगे पीछे हो जाते है । ऐसी सेवा मुझे करनी है ? ऐसी आबरू बीच में आती है, वाद-विवाद होता है, छटकबारी खोजी जाती है, सेवा दूसरों को बायपास होती है, समय और स्टेटस के सामने नजर जाती है ।

सत्संग में आंबा सेठ, कांतिभाई, जशुभाई जैसे घरधणी भी होते हैं और मेहमान, मजदूर और शत्रु जैसे भी होते हैं ।

हम किस प्रकार के हरिभक्तों में आते हैं ? उसकी स्व-जाचं करके सुधार
करें ।

 

स्व-अध्ययन

१. मंदिर मेरा घर है ऐसा ममत्वभाव निरंतर रहता है ? 

२. सच्चे सगे महाराज, सत्पुरुष और संतों-भक्तों को समझते हैं ? 

३. सीजन की नई वस्तु पहले सच्चे सगे ऐसे महाराज, सत्पुरुष और पू. संतों को अर्पण करके फिर ही घर में लाई जाती है ? 

४. देह के संबंधियों की तुलना में संतों-भक्तों को अधिक प्यारे करके रख सकते

          हैं ? 

५. मंदिर की कोई एक सेवा घरधणी होकर करने का नियम लिया है ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि,

घर में प्रसंग हो तो हम अपनी जिम्मेदारी समझकर प्रसंग की चिंता रखते हैं वैसे ही मंदिर में प्रसंग-उत्सव (समैया) हो तो घरधणी होकर उसे शोभायमान करने की सेवा उठा ही लेनी है ।

कलम

यह सत्संग मेरा घर है

घर शब्द ममत्वभाव से भरा है । इसीलिए कहा गया है कि, ‘पृथ्वी का छोर
घर ।‘ मनुष्य दुनिया के छोर तक जाए परंतु घर आने पर ही शांति होती है । तथापि, घर शब्द मात्र मिट्टी, लकड़ी या ईंट-सीमेंट के मकान के साथ ही जुड़ा नहीं है । उसमें रहने वाले सदस्यों के प्रति स्नेह इस शब्द में समाया हुआ है ।

प्यारे गुरुजी जीवनमंत्र की इस द्वितीय कलम द्वारा हमें ऐसा ही स्नेह सत्संग अर्थात् मंदिर, संतों और हरिभक्तों के साथ करने का सुझाव दे रहे हैं ।

‘यह सत्संग मेरा घर है’ ऐसा तो हम सब बोलते हैं परंतु समय आने पर सत्संग और सत्संगी बंधुओं के लिए घर-परिवार जैसा ममत्वभाव नहीं रख पाते । जिसे सत्संग घर माना गया हो, भगवान, सत्पुरुष, संत-भक्त सच्चे सगे माने गए हों उसका मंदिर और संतों-भक्तों के प्रति ममत्वभाव कैसा होता है ? वह कुछ प्रसंगों द्वारा देखते हैं ।

जब गढपुर मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था तब राजगीर ने आवाज लगाई कि, “गूगल गलाने के लिए एक खटिया चाहिए ।” परंतु किसी ने उनकी आवाज नहीं सुनी । इस कारण स्वयं श्रीजीमहाराज खड़े हुए । लाडूबा के कमरे में गए और वहां से खटिया लेकर बाहर निकले । वहां ही लाडूबा की सेविका यह दृश्य देख गई । उसने महाराज के हाथ से खटिया खींच लेने के लिए दूसरे छोर से खटिया पकड़ ली । महाराज और सेविका के बीच आपस में बहुत खींचतान हुई । परंतु महाराज ने युक्ति से खटिया छोड़ दी और सेविका खटिया के साथ नीचे गिर गई । फिर महाराज जल्दी से खटिया लेकर वहां से निकल गए । इस बात की जानकारी लाडुबा-जीवुबा को हुई इसलिए लाडुबा सेविका को डांटकर विदा करने लगे : “जा, अब तेरा मुझे कोई काम नहीं है । तूने महाराज के साथ झगड़ा किया ?” तब महाराज ने कहा, “लाडुबा, उसे निकालिए नहीं, घर में ऐसा ममत्व वाला मनुष्य तो एक चाहिए; तभी वस्तु सुरक्षित रहती है ।”

लाडुबा की सेविका की तरह हमने भी यदि सत्संग यानी मंदिर को अपना घर माना हो तो ऐसे ही ममत्वभाव से मंदिर की सेवा होगी । संतों-भक्तों को सच्चे सगे माना जाए । उनकी सेवा भी सच्चे ममत्वभाव से होगी । जैसे घर के सदस्यों की चिंता हमारी हो जाती है वैसे ही संतों-भक्तों की चिंता भी हमारी हो जाती है ।

गांव समढियाला का मंदिर बन रहा था । मंदिर की चारों तरफ की दीवार तो जैसे-तैसे खड़ी हुई । लेकिन ऊपर खपरैल (नळिया) डालना बाकी था और बारीश का मौसम था । बारिश का बहुत डर था । इसलिए सद्. वज्रानंद स्वामी को चिंता हुई कि, ‘मंदिर पर डालने के लिए खपरैल नहीं हैं । खपरैल कहीं मिल नहीं रहे
हैं । और यदि बारिश टूट पड़े और चक्रवात या तूफान आए तो मुश्किल से खड़ी की गई दीवारें भी गिर पड़ेगी ।’

स्वामी ने सभी सत्संगियों को बुलाकर बात की कि, “अब क्या करेंगे ?” तब कोई बोल नहीं सका लेकिन टींबी गांव के वीरा भगत ने स्वामी से कहा, “स्वामी, आप बैल गाड़ी भेजें । एक जगह खपरैल ध्यान में हैं तो मैं गाड़ी में रखवा देता हूं ।” स्वामी ने पूछा, “कहां हैं ?” वीरा भगत ने कहा, “स्वामी, आप चिंता न करें; एक जगह हैं । आप बैल गाड़ी मेरे साथ भेजें ।”

वीरा भगत तो निकले गाड़ी वाले को लेकर और गाड़ी ले जाकर अपने घर पर खड़ी की । खुद अपने छप्पर पर चढ़ गए और गाड़ी वाले से कहा, “भाई, मैं खपरैल देता हूं वह तू गाड़ी में रखना शुरू कर ।”

गाड़ी वाला तो एकदम दंग रह गया । क्योंकि उसे तो आश्चर्य ही लगा कि बारीश के मौसम में अपने घर के ऊपर से खपरैल लेकर मंदिर के लिए दे देना !! ऐसे काम किए जाते हैं ! यह देख साधु ने कहा, “अरे वीरा भगत, यह क्या कर रहे हो ? अपने घर से खपरैल उतारकर मंदिर में दे रहे हो ? लेकिन आपके घर का क्या होगा उसका विचार नहीं आता ? भगत, ऐसा पागलपन नहीं किया जाता ।”

वीरा भगत ने कहा, “स्वामी, यह तो मेरे देह का घर है । मंदिर तो मेरे महाराज और संतों के रहने का घर है । इस घर का जो होना होगा वह होगा लेकिन पहला घर मंदिर । मंदिर में भगवान और संत खपरैल के बिना चिंता करते हों और मैं इन खपरैल के नीचे कैसे रह सकता हूं ?? पहला मेरा मंदिर । इसलिए जल्दी ये खपरैल गाड़ी में रखना शुरू ही कर दो ।” कहते हुए सभी खपरैल लेकर गाड़ी भर दी और मंदिर पहुंचा दी ।

“महाराज मेरे बापा मेरे, गुरुजी मेरे न्यारे,

संत और मंदिर भी मेरा, सभा कभी न टालूं ।”

किशोर गीत की यह पंक्ति तो बार-बार हम बोले होंगे । आनंद में आकर ताली बजाकर झूमे भी होंगे । लेकिन वीरा भगत ने इन शब्दों को चरितार्थ किया था ।

एक बार श्रीजीमहाराज गढपुर में सभा भरकर विराजमान थे । वहां गढाळी के आंबा सेठ गाड़ी में खजूर और घी के मटके भरकर आए । इतनी सारी खजूर और घी देखकर महाराज ने पूछा, “क्यों सेठ, इतनी सारी खजूर और घी यहां लाए ?” सेठ ने विचार किया, ‘यदि सीधे तरीके से कह दूंगा कि आपको, संतों को और हरिभक्तों को खिलाने के लिए तो महाराज नाराज होंगे ।’ इसलिए सेठ ने युक्ति की, “महाराज, यहां व्यापार करने लाया हूं ।” महाराज ने कहा, “व्यापार... और
यहां ?”

सेठ ने कहा, “हां तो महाराज ! जहां मुनाफा ज्यादा और तुरंत मिले वहीं व्यापार किया जाता है न ! यहां आप, संत और हरिभक्त मेरी आत्मा के सच्चे सगे हो । आपको खिलाऊं तो आपका बहुत राज़ीपा होगा । आपका राज़ीपा ही मेरी सच्ची कमाई है । इसलिए मैं खजूर-घी की गाड़ी यहां ले आया ।” सेठ के ममत्वभाव भरे वचन सुनकर महाराज बहुत राज़ी हुए ।

नई सीजन शुरू होती है तब कोई भी वस्तु घर में लाते ही क्या हमें आंबा सेठ जैसा विचार आता है ?? हमारा जो जवाब आएगा वही हमारे ममत्वभाव की कसौटी होगी !!

वर्तमान समय में आंबा सेठ जैसे पात्रों पर प्यारे गुरुदेव और गुरुजी कईं बार राज़ीपा दर्शाते हैं । उनमें से एक दिव्य पात्र के दर्शन करते हैं । ई.स. १९८७ में वासणा मंदिर बनने के बाद संस्था में पू. संतों के लिए सीधा सामान (राशन) प.भ. श्री कांतिभाई तथा जशुभाई भावसार की किराने की दुकान से लाया जाता था । लेकिन वे उसका कभी बिल नहीं देते थे । गुरुजी हर महीने बिल मांगते थे । तीन महीने तक बिल नहीं दिया । फिर गुरुजी ने कड़क होकर कहा कि, “बिल नहीं दोगे तो तुम्हारे यहां से सामान नहीं लेंगे ।” फिर जशुभाई ने आंखों में आंसू के साथ कहा, “दयालु, मैं अपने परिवार में हर महीने १२ सदस्यों को सीधा देता हूं; कभी उनका बिल नहीं लेता । वैसे ही यह मंदिर भी मेरा घर है । ये आठ संत भी मेरे परिवार के सदस्य ही हैं । इसलिए मेरा वास्तव में २० सदस्यों का परिवार है । इसलिए इन सदस्यों का बिल कैसे लूं ?” इसे कहते हैं सत्संग मेरा घर । सत्संग में संत हमें नि:स्वार्थ भाव से दिव्यजीवन प्रदान करते हैं । इस ऋण को चुकाने के लिए हम भी उनके प्रति ऐसा ममत्वभाव विकसित करें ।

ई.स. १९८६-८७ में वासणा मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा था । प्यारे गुरुजी ने एक हरिभक्त से कहा, “भाई, ज़रा पानी छिड़कने की इतनी सेवा करेंगे ?” तब उस हरिभक्त ने कहा, “स्वामी, मेरी तरफ देखकर तो सेवा दीजिए । मेरा दो मंजिल का मकान बना लेकिन मैंने अपने घर को कभी पानी नहीं छिड़का ।” अगर सत्संग को घर माना हो तो क्या ऐसे शब्द निकलेंगे ??

इस प्रकार, सत्संग मेरा घर है – ऐसी समझ दृढ़ हुई हो तो मंदिर की, संतों-भक्तों की सेवा बहुत ममत्वभाव से होती है । अन्यथा सेवा वह सेवा नहीं बल्कि बेगार (बोझ) लगती है, भाररूप लगती है, आगे पीछे हो जाते है । ऐसी सेवा मुझे करनी है ? ऐसी आबरू बीच में आती है, वाद-विवाद होता है, छटकबारी खोजी जाती है, सेवा दूसरों को बायपास होती है, समय और स्टेटस के सामने नजर जाती है ।

सत्संग में आंबा सेठ, कांतिभाई, जशुभाई जैसे घरधणी भी होते हैं और मेहमान, मजदूर और शत्रु जैसे भी होते हैं ।

हम किस प्रकार के हरिभक्तों में आते हैं ? उसकी स्व-जाचं करके सुधार
करें ।

 

स्व-अध्ययन

१. मंदिर मेरा घर है ऐसा ममत्वभाव निरंतर रहता है ? 

२. सच्चे सगे महाराज, सत्पुरुष और संतों-भक्तों को समझते हैं ? 

३. सीजन की नई वस्तु पहले सच्चे सगे ऐसे महाराज, सत्पुरुष और पू. संतों को अर्पण करके फिर ही घर में लाई जाती है ? 

४. देह के संबंधियों की तुलना में संतों-भक्तों को अधिक प्यारे करके रख सकते

          हैं ? 

५. मंदिर की कोई एक सेवा घरधणी होकर करने का नियम लिया है ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि,

घर में प्रसंग हो तो हम अपनी जिम्मेदारी समझकर प्रसंग की चिंता रखते हैं वैसे ही मंदिर में प्रसंग-उत्सव (समैया) हो तो घरधणी होकर उसे शोभायमान करने की सेवा उठा ही लेनी है ।