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कलम

भगवान और संत की सेवा ही मेरा सुख है

लोग आज नियमित सुबह जोगिंग, वॉकिंग, योगा और कसरत के पीछे आधा-पाव घंटा बिताते हैं । क्योंकि, पहला सुख निरोगी काया अर्थात् शरीर की स्वस्थता को ही सुख मानते हैं । इसी तरह, परिवारजनों को छोड़कर सुबह से लेकर रात तक नौकरी-धंधे पर दिन व्यतीत करते हैं । क्योंकि, पैसा मेरा परमेश्वर अर्थात् पैसा ही सर्वस्व माना गया है ।

इस प्रकार, दैहिक स्वस्थता, पैसा, स्टेटस, प्रसिद्धि, रंग-राग, भोग-विलास, साज-सामान और रजोगुणी जगत के मायिक नाशवंत तुच्छ पदार्थों में ही जगत के जीव सुख मानते है । जबकि भगवान के भक्त को भगवान और संत की सेवा में सुख माना जाता है । क्योंकि, मायिक पदार्थों में आसक्ति जन्म-मरण के चक्र को खड़ा करती है और संतों-भक्तों की सेवा से महाराज और सत्पुरुष के अंतर का राज़ीपा प्राप्त होता है । सेवा से अशुद्ध अंतःकरण शुद्ध और पवित्र होता
है । सेवा से अहंकार पिघलता है और दासत्वभाव आता है । इसलिए, जिसे भगवान और संत की सेवा में सुख माना जाए उसकी ही मूर्ति के सुख की ओर प्रगति होती है ।

इसीलिए कीर्तन में भी कहा गया है कि,

“अनादिमुक्त की सेवा, मेरे लिए तो मीठे मेवे;

मेरे लिए तो मीठे मेवे, श्रीजी की मूर्ति में रहने के लिए ।”

जिसे सेवा की ऐसी महिमा समझ में आई हो उसे सेवा करने में आनंद आता
है । भार, कठिनाई, तकलीफ नहीं लगती, सेवा में ही सुख माना जाता है ।

स्वयं अक्षरधाम के अधिपति भगवान स्वामिनारायण जब नीलकंठ वर्णी स्वरूप में लोज पधारे तब स्व-जीवन द्वारा सेवा का महत्त्व समझाया है । पूरे आश्रम में गोबर साफ करते, साफ-सफाई करते, बर्तन मांजते, भिक्षा मांगने जाते, लकड़ियां काटकर उसका गट्ठर लेने जाते, संतों के गातड़ियां (वस्त्र) धोते, रोज सुबह गोबर के उपले बीनने जाते और टोकरी भरकर सिर पर उठाकर लाते । एक बार तो लोज से दो कोस दूर आए हुए शील गांव से स्वयं २२ मन आरिया अपने सिर पर उठाकर लाए थे ।

गढ़पुर में मंदिर बन रहा था तब महाराज ने सबको आज्ञा की थी कि, सबको पत्थर सिर पर उठाकर मंदिर की नींव में डालना और शुरुआत महाराज स्वयं करते थे । महाराज को देखकर संत-हरिभक्त सभी सेवा में लग जाते । पूरा दिन संत-हरिभक्त बहुत सेवा करते थे ।

उस समय रघुनाथानंद स्वामी बीमार संतों की सेवा में लगे रहते थे । जिससे वे मंदिर की सेवा में जा नहीं पाते थे । पूरा दिन संतों को नहलाना-धुलाना, उनकी धोती धोना, उनके चरण दबाना, सिर दु:खता हो तो सिर दबाना, पट्टी रखना आदि बहुत सेवा करते और उसमें व्यस्त रहते जिससे पत्थर उठाने की सेवा का लाभ नहीं ले पाते थे । इसलिए उन्हें दु:ख रहता कि, ‘अरेरे... मुझसे कोई सेवा होती नहीं है ।’ इसलिए वे रोज जितनी बार घेला (नदी) में स्नान करने जाते उतनी बार भारी से भारी पत्थर सिर पर उठाकर लाते । साथ ही, प्रतिदिन रात को छुपके से महाराज को पता न चले वैसे अंधेरे में नदी पर जाते और पत्थर उठाकर लाते और नींव में डालते । प्रतिदिन का यह क्रम था । पर यह बात कोई नहीं जानता था । एक बार आधी रात को कुछ आवाज हुई और महाराज जाग गए और बाहर आकर पूछा कि, “कौन है ? अभी क्या कर रहे  हैं ?” देखा तो रघुनाथानंद स्वामी ।

महाराज ने कहा, “अरे स्वामी ! अभी क्या कर रहे हो ?”

स्वामी ने कहा, “महाराज, पूरा दिन सभी संत और हरिभक्त कितनी सेवा करते हैं और मैं बीमार संतों की सेवा में व्यस्त होता हूं इसलिए मुझे समय मिलता नहीं
है । इसलिए मैं रात को पत्थर डालने की सेवा करता हूं ।”

यह सुनकर महाराज उन पर बहुत राज़ी हो गए । महाराज ने उन्हें बाहों में भरकर गले लगा लिया और बहुत राज़ीपा दिखाया ।

कितना सारा आग्रह ! सेवा ही सुख माना हो उससे ही ऐसा हो सकता है । भौतिक सुख की महिमा समझी गई है तो उसके लिए पूरा दिन कैसी भागदौड़ होती है !! परंतु भगवान और भगवान के संतों के लिए ही यह जीवन है और उनकी सेवा ही सुख माना जाए तब सच्चे सत्संग की पहचान हुई कहलाता है ।

एक बार महाराज तावीतलसाणा गांव से देवलिया गांव की ओर पधार रहे
थे । वहां रास्ते में देवलिया गांव की सीमा पर आकर महाराज पेड़ के नीचे बिराज गए । महाराज ने कहा, “हमें आगे नहीं आना है । हमारी दाढ़ी-मूंछ बढ़ गई हैं । हमारी आबरू जाएगी । हजामत कराने के बाद ही आगे बढ़ेंगे ।” अब गांव कहां दूर था ? गांव की सीमा पर तो पधार ही गए थे और महाराज ने यह लीला की ।

देवलिया गांव के जालमसिंह बापू महाराज को लेने के लिए सामने से आए थे और उन्होंने महाराज की यह बात सुनी । वे वहीं से महाराज के दर्शन कर ‘अभी ही नाई को लेकर आता हूं’ ऐसा कहकर घोड़े पर सवार होकर जल्दी गांव में आए और गए नाई के घर । और कहा, “जल्दी चल, हमारे महाराज की हजामत करनी है । अभी और इसी वक्त चल ।”

वह नाई तो आनंद में आ गया । उसकी खुशी का ठिकाना न रहा कि, ‘अहोहो... आज मुझ पर कितनी अहोकृपा कि गांव के बापू स्वयं चलकर मेरे घर पधारे और मुझे उन्होंने सेवा दी...’

जालमसिंह बापू ने तो नाई का थैला अपने हाथ में ले लिया और नाई को घोड़े पर बैठा दिया । नाई ना-ना करता रहा और बापू ने नाई को बैठा दिया । स्वयं नाई का थैला हाथ में पकड़कर दौड़ने लगे ।

गांव के लोग यह दृश्य देखकर चकित रह गए और कहने लगे, “अरे बापू, यह क्या ? नाई आपके घोड़े पर और आप हाथ में नाई का थैला लेकर दौड़ रहे हैं !” तब बापू ने कहा, “उसमें क्या ! अभी तो अनंतकोटि ब्रह्मांड के अधिपति श्री स्वामिनारायण भगवान की सेवा करनी है । उनकी सेवा में शर्म कैसी ?”

और महाराज की हजामत करवाई, सामैया (स्वागत) कर गांव में पधरामणी करवाई । महाराज उन पर बहुत राज़ी हुए ।

इस लोक की दृष्टि से कितना भी बड़प्पन (महानता) हो परंतु भगवान और उनके संत के आगे तो हम कुछ भी नहीं हैं । उनके आगे तो हम दास के दास ही हैं ऐसा न्यूनभाव रहता हो तो उनकी सेवा ही सुख माना जाता है ।

वचन की मूर्ति समान सद्. श्री आत्मानंद स्वामी ने अंतिम अवस्था में बहुत बीमारी ग्रहण की थी । तब बोटाद के शिवलाल सेठ सद्. श्री आत्मानंद स्वामी की सेवा में थे । स्वामी को अवस्था के भाव से बार-बार नहाने जाना पड़ता
था । वह सब शिवलाल सेठ साफ करते थे, स्वामी की धोती धोते थे । बिस्तर साफ करते थे । स्वयं लखपति होने के बावजूद सारी सेवा खुद करते थे । किसी ने कहा, “यह सब साफ करने के लिए नौकर रखलो तो ।” तब शिवलाल सेठ कहते, “मैं भी स्वामी का नौकर ही हूं ना । इस सेवा का लाभ मुझे कहां से मिले ? यह सेवा तो किसी को न दी जाए । संतों की सेवा ही तो मेरा सुख है ।”

स्वामी को आठ महीने तक बीमारी रही और आठ महीने तक शिवलाल सेठ ने स्वामी की बहुत लगन से सेवा की, एकमात्र राज़ीपा की इच्छा से ।

स्वामी उन पर बहुत राज़ी हुए और कुछ वरदान मांगने को कहा तब शिवलाल सेठ ने उनके तेरहवें दिन खुद को धाम में ले जाने का वरदान मांगा और २૮ वर्ष की छोटी उम्र में स्वयं मूर्ति के सुख से सुखी हुए । इस लोक में भी वे बहुत ही अंतवृत्ति के अंगवाले महाराज के बड़े मुक्त थे ।

सेवा करने से होने वाला सबसे बड़ा फायदा बताते हुए महाराज ने स्वमुख से गढ़डा प्रथम के ૮वें वचनामृत में भी कहा है कि, “इंद्रियों की जो क्रिया है उसे यदि भगवान और उनके भक्त की सेवा में रखे तो अंतःकरण शुद्ध होता है और अनंतकाल के जो पाप जीव को लगे हैं उनका नाश हो जाता है ।”

इस प्रकार, सभी दोष को दूर करने का एकमात्र उपाय है भगवान और संत की सेवा । सभी सुख को पाने का और सभी दु:ख को दूर करने का एकमात्र उपाय है भगवान और संत की सेवा ।

सेवा भी दो तरह से होती है : (१) मान से, दंभ से, प्रशंसा के लिए, ईर्ष्या से, दबाव से या डर से आदि तरीके से, (२) महिमा सहित सेवा ।

महिमा सहित होने वाली सेवा में भार, कठिनाई और तकलीफ नहीं लगती । और किसी भी प्रकार के स्वार्थ के बिना यदि महिमा से सेवा हो तो भगवान और संत का राज़ीपा होता है । उस राज़ीपा के बदले में मूर्ति का अति उत्तम सुख प्राप्त होता है ।

इसलिए भगवान और भगवान के सच्चे संत की सेवा निःस्वार्थ भाव से अपने ऊपर हुई अहोकृपा समझकर कर लेना वही सच्चा सुख है । जीवन की वही सच्ची पूंजी है ।

 

स्व-अध्ययन

  1. घरमंदिर में महाराज की किसी भी एक सेवा का नियमित लाभ लिया जाता है ?
  2. छोटे से छोटे पू. संत आज्ञा करें तो उनके वचन पर कोई भी सेवा उत्साह के साथ कर सकते हैं ?
  3. बीमार पू. संतों की तन, मन, धन से सेवा करने का आग्रह रहता है ?
  4. सत्संग प्रचार की सेवा का लाभ लेते हैं ?
  5. मंदिर में कार्यकर्ता के रूप में सेवा देकर पू. संतों को मददगार बनते हैं ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि,

मुझे मिले हुए संतों-भक्तों की कोई भी सेवा दिव्यभाव से, निर्विकल्प और निःसंशय होकर ही करनी है ।

कलम

भगवान और संत की सेवा ही मेरा सुख है

लोग आज नियमित सुबह जोगिंग, वॉकिंग, योगा और कसरत के पीछे आधा-पाव घंटा बिताते हैं । क्योंकि, पहला सुख निरोगी काया अर्थात् शरीर की स्वस्थता को ही सुख मानते हैं । इसी तरह, परिवारजनों को छोड़कर सुबह से लेकर रात तक नौकरी-धंधे पर दिन व्यतीत करते हैं । क्योंकि, पैसा मेरा परमेश्वर अर्थात् पैसा ही सर्वस्व माना गया है ।

इस प्रकार, दैहिक स्वस्थता, पैसा, स्टेटस, प्रसिद्धि, रंग-राग, भोग-विलास, साज-सामान और रजोगुणी जगत के मायिक नाशवंत तुच्छ पदार्थों में ही जगत के जीव सुख मानते है । जबकि भगवान के भक्त को भगवान और संत की सेवा में सुख माना जाता है । क्योंकि, मायिक पदार्थों में आसक्ति जन्म-मरण के चक्र को खड़ा करती है और संतों-भक्तों की सेवा से महाराज और सत्पुरुष के अंतर का राज़ीपा प्राप्त होता है । सेवा से अशुद्ध अंतःकरण शुद्ध और पवित्र होता
है । सेवा से अहंकार पिघलता है और दासत्वभाव आता है । इसलिए, जिसे भगवान और संत की सेवा में सुख माना जाए उसकी ही मूर्ति के सुख की ओर प्रगति होती है ।

इसीलिए कीर्तन में भी कहा गया है कि,

“अनादिमुक्त की सेवा, मेरे लिए तो मीठे मेवे;

मेरे लिए तो मीठे मेवे, श्रीजी की मूर्ति में रहने के लिए ।”

जिसे सेवा की ऐसी महिमा समझ में आई हो उसे सेवा करने में आनंद आता
है । भार, कठिनाई, तकलीफ नहीं लगती, सेवा में ही सुख माना जाता है ।

स्वयं अक्षरधाम के अधिपति भगवान स्वामिनारायण जब नीलकंठ वर्णी स्वरूप में लोज पधारे तब स्व-जीवन द्वारा सेवा का महत्त्व समझाया है । पूरे आश्रम में गोबर साफ करते, साफ-सफाई करते, बर्तन मांजते, भिक्षा मांगने जाते, लकड़ियां काटकर उसका गट्ठर लेने जाते, संतों के गातड़ियां (वस्त्र) धोते, रोज सुबह गोबर के उपले बीनने जाते और टोकरी भरकर सिर पर उठाकर लाते । एक बार तो लोज से दो कोस दूर आए हुए शील गांव से स्वयं २२ मन आरिया अपने सिर पर उठाकर लाए थे ।

गढ़पुर में मंदिर बन रहा था तब महाराज ने सबको आज्ञा की थी कि, सबको पत्थर सिर पर उठाकर मंदिर की नींव में डालना और शुरुआत महाराज स्वयं करते थे । महाराज को देखकर संत-हरिभक्त सभी सेवा में लग जाते । पूरा दिन संत-हरिभक्त बहुत सेवा करते थे ।

उस समय रघुनाथानंद स्वामी बीमार संतों की सेवा में लगे रहते थे । जिससे वे मंदिर की सेवा में जा नहीं पाते थे । पूरा दिन संतों को नहलाना-धुलाना, उनकी धोती धोना, उनके चरण दबाना, सिर दु:खता हो तो सिर दबाना, पट्टी रखना आदि बहुत सेवा करते और उसमें व्यस्त रहते जिससे पत्थर उठाने की सेवा का लाभ नहीं ले पाते थे । इसलिए उन्हें दु:ख रहता कि, ‘अरेरे... मुझसे कोई सेवा होती नहीं है ।’ इसलिए वे रोज जितनी बार घेला (नदी) में स्नान करने जाते उतनी बार भारी से भारी पत्थर सिर पर उठाकर लाते । साथ ही, प्रतिदिन रात को छुपके से महाराज को पता न चले वैसे अंधेरे में नदी पर जाते और पत्थर उठाकर लाते और नींव में डालते । प्रतिदिन का यह क्रम था । पर यह बात कोई नहीं जानता था । एक बार आधी रात को कुछ आवाज हुई और महाराज जाग गए और बाहर आकर पूछा कि, “कौन है ? अभी क्या कर रहे  हैं ?” देखा तो रघुनाथानंद स्वामी ।

महाराज ने कहा, “अरे स्वामी ! अभी क्या कर रहे हो ?”

स्वामी ने कहा, “महाराज, पूरा दिन सभी संत और हरिभक्त कितनी सेवा करते हैं और मैं बीमार संतों की सेवा में व्यस्त होता हूं इसलिए मुझे समय मिलता नहीं
है । इसलिए मैं रात को पत्थर डालने की सेवा करता हूं ।”

यह सुनकर महाराज उन पर बहुत राज़ी हो गए । महाराज ने उन्हें बाहों में भरकर गले लगा लिया और बहुत राज़ीपा दिखाया ।

कितना सारा आग्रह ! सेवा ही सुख माना हो उससे ही ऐसा हो सकता है । भौतिक सुख की महिमा समझी गई है तो उसके लिए पूरा दिन कैसी भागदौड़ होती है !! परंतु भगवान और भगवान के संतों के लिए ही यह जीवन है और उनकी सेवा ही सुख माना जाए तब सच्चे सत्संग की पहचान हुई कहलाता है ।

एक बार महाराज तावीतलसाणा गांव से देवलिया गांव की ओर पधार रहे
थे । वहां रास्ते में देवलिया गांव की सीमा पर आकर महाराज पेड़ के नीचे बिराज गए । महाराज ने कहा, “हमें आगे नहीं आना है । हमारी दाढ़ी-मूंछ बढ़ गई हैं । हमारी आबरू जाएगी । हजामत कराने के बाद ही आगे बढ़ेंगे ।” अब गांव कहां दूर था ? गांव की सीमा पर तो पधार ही गए थे और महाराज ने यह लीला की ।

देवलिया गांव के जालमसिंह बापू महाराज को लेने के लिए सामने से आए थे और उन्होंने महाराज की यह बात सुनी । वे वहीं से महाराज के दर्शन कर ‘अभी ही नाई को लेकर आता हूं’ ऐसा कहकर घोड़े पर सवार होकर जल्दी गांव में आए और गए नाई के घर । और कहा, “जल्दी चल, हमारे महाराज की हजामत करनी है । अभी और इसी वक्त चल ।”

वह नाई तो आनंद में आ गया । उसकी खुशी का ठिकाना न रहा कि, ‘अहोहो... आज मुझ पर कितनी अहोकृपा कि गांव के बापू स्वयं चलकर मेरे घर पधारे और मुझे उन्होंने सेवा दी...’

जालमसिंह बापू ने तो नाई का थैला अपने हाथ में ले लिया और नाई को घोड़े पर बैठा दिया । नाई ना-ना करता रहा और बापू ने नाई को बैठा दिया । स्वयं नाई का थैला हाथ में पकड़कर दौड़ने लगे ।

गांव के लोग यह दृश्य देखकर चकित रह गए और कहने लगे, “अरे बापू, यह क्या ? नाई आपके घोड़े पर और आप हाथ में नाई का थैला लेकर दौड़ रहे हैं !” तब बापू ने कहा, “उसमें क्या ! अभी तो अनंतकोटि ब्रह्मांड के अधिपति श्री स्वामिनारायण भगवान की सेवा करनी है । उनकी सेवा में शर्म कैसी ?”

और महाराज की हजामत करवाई, सामैया (स्वागत) कर गांव में पधरामणी करवाई । महाराज उन पर बहुत राज़ी हुए ।

इस लोक की दृष्टि से कितना भी बड़प्पन (महानता) हो परंतु भगवान और उनके संत के आगे तो हम कुछ भी नहीं हैं । उनके आगे तो हम दास के दास ही हैं ऐसा न्यूनभाव रहता हो तो उनकी सेवा ही सुख माना जाता है ।

वचन की मूर्ति समान सद्. श्री आत्मानंद स्वामी ने अंतिम अवस्था में बहुत बीमारी ग्रहण की थी । तब बोटाद के शिवलाल सेठ सद्. श्री आत्मानंद स्वामी की सेवा में थे । स्वामी को अवस्था के भाव से बार-बार नहाने जाना पड़ता
था । वह सब शिवलाल सेठ साफ करते थे, स्वामी की धोती धोते थे । बिस्तर साफ करते थे । स्वयं लखपति होने के बावजूद सारी सेवा खुद करते थे । किसी ने कहा, “यह सब साफ करने के लिए नौकर रखलो तो ।” तब शिवलाल सेठ कहते, “मैं भी स्वामी का नौकर ही हूं ना । इस सेवा का लाभ मुझे कहां से मिले ? यह सेवा तो किसी को न दी जाए । संतों की सेवा ही तो मेरा सुख है ।”

स्वामी को आठ महीने तक बीमारी रही और आठ महीने तक शिवलाल सेठ ने स्वामी की बहुत लगन से सेवा की, एकमात्र राज़ीपा की इच्छा से ।

स्वामी उन पर बहुत राज़ी हुए और कुछ वरदान मांगने को कहा तब शिवलाल सेठ ने उनके तेरहवें दिन खुद को धाम में ले जाने का वरदान मांगा और २૮ वर्ष की छोटी उम्र में स्वयं मूर्ति के सुख से सुखी हुए । इस लोक में भी वे बहुत ही अंतवृत्ति के अंगवाले महाराज के बड़े मुक्त थे ।

सेवा करने से होने वाला सबसे बड़ा फायदा बताते हुए महाराज ने स्वमुख से गढ़डा प्रथम के ૮वें वचनामृत में भी कहा है कि, “इंद्रियों की जो क्रिया है उसे यदि भगवान और उनके भक्त की सेवा में रखे तो अंतःकरण शुद्ध होता है और अनंतकाल के जो पाप जीव को लगे हैं उनका नाश हो जाता है ।”

इस प्रकार, सभी दोष को दूर करने का एकमात्र उपाय है भगवान और संत की सेवा । सभी सुख को पाने का और सभी दु:ख को दूर करने का एकमात्र उपाय है भगवान और संत की सेवा ।

सेवा भी दो तरह से होती है : (१) मान से, दंभ से, प्रशंसा के लिए, ईर्ष्या से, दबाव से या डर से आदि तरीके से, (२) महिमा सहित सेवा ।

महिमा सहित होने वाली सेवा में भार, कठिनाई और तकलीफ नहीं लगती । और किसी भी प्रकार के स्वार्थ के बिना यदि महिमा से सेवा हो तो भगवान और संत का राज़ीपा होता है । उस राज़ीपा के बदले में मूर्ति का अति उत्तम सुख प्राप्त होता है ।

इसलिए भगवान और भगवान के सच्चे संत की सेवा निःस्वार्थ भाव से अपने ऊपर हुई अहोकृपा समझकर कर लेना वही सच्चा सुख है । जीवन की वही सच्ची पूंजी है ।

 

स्व-अध्ययन

  1. घरमंदिर में महाराज की किसी भी एक सेवा का नियमित लाभ लिया जाता है ?
  2. छोटे से छोटे पू. संत आज्ञा करें तो उनके वचन पर कोई भी सेवा उत्साह के साथ कर सकते हैं ?
  3. बीमार पू. संतों की तन, मन, धन से सेवा करने का आग्रह रहता है ?
  4. सत्संग प्रचार की सेवा का लाभ लेते हैं ?
  5. मंदिर में कार्यकर्ता के रूप में सेवा देकर पू. संतों को मददगार बनते हैं ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि,

मुझे मिले हुए संतों-भक्तों की कोई भी सेवा दिव्यभाव से, निर्विकल्प और निःसंशय होकर ही करनी है ।