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कलम

उन्हीं के होकर ही सदा जीना है

जब कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ विवाह बंधन में बंधती है, तब से वह उस पुरुष की हो जाती है । उसके नाम के पीछे अब उस पुरुष का नाम लगता है । वह अपने माथे पर उस पुरुष का सिंदूर लगाती है और अपने गले में उस पुरुष का मंगलसूत्र रखती है । यही हिंदू धर्म की प्राचीन रीति है । यह करने में स्त्री को कोई शर्म या संकोच नहीं होता । बल्कि गौरव होता है । वैसे ही हमें भगवान स्वामिनारायण के आश्रित होने के बाद उनके कहलाने में और उनके होकर जीने में संकोच नहीं, गौरव होना चाहिए । यदि कोई हमें स्वामिनारायण के कहे तो गौरव से छाती ठोककर कहना चाहिए कि, ‘हां, हां एक बार नहीं लाख बार स्वामिनारायण का था और हूं और स्वामिनारायण का होकर ही जीऊंगा । बोलो क्या कहना है ?’

आज तक अनंत देह धारण किए, उसमें देह के सगे-संबंधियों तथा बीवी-बच्चों के होकर रहे । अब इस जन्म में तो बीवी-बच्चों के या देह के सगे-संबंधियों के होकर नहीं रहना है, परंतु महाराज और सत्पुरुष के होकर ही जीना है । और उसके लिए चाहे कैसी भी मुश्किलें आएं, कैसी भी कठिन कसौटी से पार उतरना पड़े, फिर भी इस देह से तो मुझे महाराज और सत्पुरुष को राज़ी कर ही लेना है, ऐसा आग्रह रखना चाहिए ।

पहले के संतों-हरिभक्तों ने तो कितने दुःख सहे हैं और कितनी कठिन कसौटियों से सफलतापूर्वक पार उतरे हैं और फिर भी महाराज को नहीं छोड़ा
है ।

संवत १८७६ में श्रीहरि ने जलझीलनी का उत्सव किया । संतों के साथ जलक्रीड़ा करने के बाद महाराज ने सभा की । इतने में दूर से एक संत को आते देखा । उन्होंने पास आकर महाराज को दंडवत किए । परंतु दंडवत ठीक से नहीं कर सके । धीरे-धीरे महाराज के पास आए और चरणों में सिर रखकर रोने लगे । महाराज ने उनके मस्तक पर दो हाथ रखकर शांत किया । फिर पूछा, “साधुराम ! आपको क्या हुआ है ?” उन्होंने महाराज से कहा, “महाराज ! मेरे जीव में से या तो आपके स्वरूप का निश्चय निकाल दीजिए और या तो मुझे आपके पास सत्संग में रखिए ।” उनकी यह व्याकुलता देखकर महाराज ने कहा, “साधुराम ! हमारे स्वरूप का निश्चय आपके अंतर से निकाल देना वह हमारे हाथ में नहीं है । वह तो कुसंगियों का काम है । उसके लिए आपको यहां आने की ज़रूरत नहीं है ।”

यह सुनकर स्वामी फिर रोने लगे । उनसे खड़ा भी नहीं रहा जा रहा था इसलिए अचानक नीचे गिर पड़े । उनके शरीर पर से वस्त्र खिसक गया । उनके पूरे शरीर पर बाहर आ गए मांस के लोथड़े दिख रहे थे । महाराज तुरंत खड़े हो गए और उनके पास बैठ गए और धीरे से पूछा, “साधुराम ! यह क्या हुआ ? पूरे शरीर को यह उपाधि किसने की ? किसने ऐसा कहर किया ?”

स्वामी ने कहा, “महाराज, एक छोटे गांव में परोक्ष का स्थान था । वहां रात को दस बजे मैं पहुंचा और वहीं रहने का निश्चय किया । झोली लटकाकर मैं स्वामिनारायण... स्वामिनारायण... इस प्रकार आपका भजन करने लगा । वह सुनकर वहां ठहरे हुए दूसरे बैरागी मेरे पास आए और मुझसे पूछा, ‘तुम किसका साधु है और क्या भजन करते हो ?’ मैंने तो कहा, ‘मैं स्वामिनारायण भगवान का साधु हूं और उन्हीं का भजन करता हूं । यदि आपको पसंद न हो तो मन में भजन करूंगा ।’ पर वे तो स्वामिनारायण नाम सुनकर भड़क गए । मुझसे कहा, ‘स्वामिनारायण का भजन छोड़ दे, नहीं तो तुम को जला देगा ।’ पर महाराज, आपका हूं और आपका होकर ही मुझे जीना था इसलिए मैंने उनकी कोई बात नहीं सुनी । और एकांत में बैठकर स्वामिनारायण धुन करने लगा । इसलिए वे बहुत चिढ़ गए । उन्होंने भट्ठी में चिमटे रखकर बहुत तपाए और फिर मेरे पास आकर कहा, ‘बाबुडी ! स्वामिनारायण का नाम मत लेना, ये देखा ? अभी तुम को जला देगा ।’ मैंने फिर नाम मन में बोलना शुरू किया । पर मेरे होंठ फड़फड़ाते देखे इसलिए मुझे नीचे गिराकर लाल-तप्त हुए चिमटों से मेरे पूरे शरीर पर दाग देने लगे । उस दुःख से मुझसे ज़ोर से ‘स्वामिनारायण... स्वामिनारायण...’ बोल दिया जाता । इसलिए स्वामिनारायण नाम सुनकर वे फिर दाग देने लगे । फिर तो मुझे कुछ होश नहीं रहा । इसलिए वे सब अपनी जगह जाकर सो गए । सुबह हुई । मैं होश में आया और सीधा गढपुर आपके पास पहुंचा हूं ।”

महाराज की आंखों से आंसू बहने लगे । महाराज के हाथ इस साधु के शरीर पर फिरने लगे । अचानक महाराज ने कहा, “इस साधु का बिस्तर हमारी अक्षरओरडी पास ही करवाओ । हम उनकी सेवा में रहेंगे ।” यह सुनकर सद्. नित्यानंद स्वामी, सद्. ब्रह्मानंद स्वामी आदि संत बोल उठे, “महाराज ! आप कहेंगे उस प्रकार हम स्वामी की सेवा करेंगे । आपको क्यों तकलीफ लेनी चाहिए ?” महाराज ने करुण स्वर में कहा, “मुझे तकलीफ नहीं है, मुझे व्यथा है स्वामी ! ये दाग हमारे शरीर पर पड़े हैं । इतने दाग देने के बावजूद इस साधु ने हमें नहीं छोड़ा है तो अब हम उन्हें कैसे छोड़ें ? हम उनके पास ही रहेंगे, उनकी सेवा करेंगे । उनकी व्यथा मिटेगी तभी हमारे अंतर में शांति होगी ।”

इन साधुराम पर कितनी विकट स्थिति-परिस्थिति आई फिर भी महाराज को नहीं छोड़ा । महाराज के होकर ही रहे । महाराज के होकर ही जिए तो महाराज के अंतर का राज़ीपा कमा सके । वैसे ही हमें भी देह के सगे-संबंधियों के, विरोधियों के कटु वचन सुनने के कदाचित संयोग आएं फिर भी महाराज और सत्पुरुष को न छोड़े । केवल एक महाराज और सत्पुरुष के वफादार रहकर उनके होकर ही जीवन जीए ।

सौराष्ट्र प्रदेश के जेतपुर गांव में जीवा जोशी नाम के एक पवित्र ब्राह्मण रहते
थे । वे श्रीजीमहाराज के अनन्य उपासक, संपूर्ण आज्ञापालक, निर्भय भक्त थे । इष्टदेव की छोटी से छोटी आज्ञा को भी आदर से सावधानीपूर्वक पालते और अपने स्त्री-पुत्र आदि सभी परिवारजनों में भी उन्होंने सत्संग के गहरे संस्कार लगातार सावधानी रखकर डाले थे । और हमेशा भगवत् कथावार्ता सुनाकर उन्हें सत्संग की उत्तम दृढ़ता कराई थी । उन्होंने अपने संपर्क में आने वाले कईं लोगों को बुरी आदतें छुड़वाकर सदाचारी बनाया था ।

जीवा जोशी की धर्म-नियम पालन की दृढ़ता, सत्संग का बल और आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर होने के बावजूद बहुत संतोषपूर्वक निश्चित रूप से आनंद में रहने की आदत देखकर कुछ कम समझ वाले लोग तथा सगे-संबंधी ईर्ष्या भाव रखकर उन्हें हर बार मुश्किल में डालते । स्वामिनारायण भगवान और स्वामिनारायण संप्रदाय का धर्म छुड़वाने की कोशिश करते । फिर भी जाति और गांव के लोगों की कठिन कसौटी भी सहन करके उन्होंने सिर के बदले (प्राणों की बाज़ी लगाकर) सत्संग रखा था । समाज में घर कर गए प्याज, लहसुन आदि तामसी आहार तथा गांजा, भांग, अफीम और तंबाकू इत्यादि व्यसन जो विशेष रूप से त्याज्य माने गए हैं, वे जीवा जोशी कभी खाते-पीते नहीं थे । सात्त्विक आहार के अलावा वे कोई भी वस्तु उपयोग में नहीं लेते थे । अपने सगे-संबंधियों में त्यौहारों पर भोजन का अवसर आए तब तथा विवाह या मृत्यु के प्रसंग में अथवा ब्राह्मणों की चौरासी आदि के भोजन प्रसंगों में भोजन करने जाना पड़े तब दाल-सब्जी आदि वस्तुओं में लहसुन, प्याज या हींग हो तो किसी को कुछ भी बताए बिना केवल लड्डू खा लेते थे । धीरे-धीरे यह बात जब दूसरे लोगों के पूरी तरह ध्यान में आई तब कुछ जल्दबाज़ स्वभाव के द्वेषी लोग जो मन में आए वैसा बोलकर बार-बार परेशान करते और जीवा जोशी के साथ बैर रखकर निंदा करने लगे । परंतु वे तो मौन रहकर शांति से भजन-स्मरण करते थे इसलिए उन लोगों का कुछ चलता नहीं था ।

एक बार श्रीजीमहाराज जेतपुर पधारे तब जीवा जोषी पुत्रों सहित पैर छुकर सभा में बैठे तो महाराज ने कहा, “ये आपके बेटे बड़े हो गए हैं फिर भी जनेऊ क्यों नहीं दी ?” जोशी ने कहा, “आर्थिक स्थिति कमज़ोर है । अभी देश-काल भी अनुकूल नहीं है ।” महाराज ने तुरंत ही पूछा, “जनेऊ देने में कितना खर्च होता
है ?” तब उन्होंने कहा, “यदि साधारण करें तो दो सौ कोरी खर्च होता है और अच्छा करें तो पांच सौ कोरी लगता है ।” फिर एक गुणबुद्धिवाले व्यापारी दर्शन करने आए । उन्हें महाराज ने सिफारिश की कि, “हमारे खाते में लिखकर आपकी दुकान से जो चाहिए वह पांच सौ कोरी तक का माल इन जीवा जोशी को देंगे ?” तो सेठ ने हां कहा । फिर दूसरे दिन महाराज ने दोनों भाइयों को विधिपूर्वक जनेऊ दी । इस अवसर पर सभी सगे-संबंधियों को भोजन के लिए निमंत्रण पहले से दिए थे जो सभी ने स्वीकार किए थे परंतु भोजन का समय हुआ तब गहरी ईर्ष्या के कारण कोई भोजन करने नहीं आया । तब महाराज ने न आने का कारण पूछा तो किसी ने कहा कि, “एक ग्रंथ में लिखा है कि, जिस लड़के को दूसरे ने जनेऊ दी हो उस लड़के के हाथ का श्राद्ध उसके पिता को नहीं पहुंचता पर जनेऊ देने वाले को मिलता है ।” तब महाराज ने कहा, “हमें जो मिलेगा वह पूरे जगत को पहुंच
जाएगा ।” यह बात सुनकर जाति के लोग चले गए पर भोजन करने नहीं बैठे । फिर रसोई तैयार थी वह साधु, पार्षद तथा सत्संगियों को खिला दी और गरीब लोगों को खिलाया । परंतु जाति के लोगों के मोह (मुहब्बत) में आकर श्रीजीमहाराज को नहीं छोड़ा । क्योंकि, दृढ़ था कि उन्हीं के होकर ही सदा जीना है ।



 

स्व-अध्ययन

  1. महाराज और सत्पुरुष के लिए कभी ढीला शब्द न सुन लेकर क्या हम कड़ा जवाब दे सकते हैं ?
  2. सत्संग में मान-अपमान हो तो कभी दूर न होते हुए कल्याण की गरज रखकर संतों-भक्तों से अधिक से अधिक निकट रहने के आग्रही बनते हैं ?
  3. कितनी भी मुश्किल आए, विपरीत संयोग आए उसमें कभी महाराज और सत्पुरुष को नहीं छोड़कर उनके साथ जीव जोड़कर उनके सान्निध्य में ही रहने की गरज रहती है ?
  4. हमेशा महाराज और सत्पुरुष का वफादार रहा जाता है ?
  5. सत्पुरुष के लिए कोई गलत बोले तो सत्पुरुष के स्वरूप में निःसंशयपना रहता है ?

दृढ़ संकल्प करें कि,

मिले हुए महाराज और सत्पुरुष से अधिक स्नेह-प्रीति किसी और में नहीं ही होने देनी है ।

कलम

उन्हीं के होकर ही सदा जीना है

जब कोई स्त्री किसी पुरुष के साथ विवाह बंधन में बंधती है, तब से वह उस पुरुष की हो जाती है । उसके नाम के पीछे अब उस पुरुष का नाम लगता है । वह अपने माथे पर उस पुरुष का सिंदूर लगाती है और अपने गले में उस पुरुष का मंगलसूत्र रखती है । यही हिंदू धर्म की प्राचीन रीति है । यह करने में स्त्री को कोई शर्म या संकोच नहीं होता । बल्कि गौरव होता है । वैसे ही हमें भगवान स्वामिनारायण के आश्रित होने के बाद उनके कहलाने में और उनके होकर जीने में संकोच नहीं, गौरव होना चाहिए । यदि कोई हमें स्वामिनारायण के कहे तो गौरव से छाती ठोककर कहना चाहिए कि, ‘हां, हां एक बार नहीं लाख बार स्वामिनारायण का था और हूं और स्वामिनारायण का होकर ही जीऊंगा । बोलो क्या कहना है ?’

आज तक अनंत देह धारण किए, उसमें देह के सगे-संबंधियों तथा बीवी-बच्चों के होकर रहे । अब इस जन्म में तो बीवी-बच्चों के या देह के सगे-संबंधियों के होकर नहीं रहना है, परंतु महाराज और सत्पुरुष के होकर ही जीना है । और उसके लिए चाहे कैसी भी मुश्किलें आएं, कैसी भी कठिन कसौटी से पार उतरना पड़े, फिर भी इस देह से तो मुझे महाराज और सत्पुरुष को राज़ी कर ही लेना है, ऐसा आग्रह रखना चाहिए ।

पहले के संतों-हरिभक्तों ने तो कितने दुःख सहे हैं और कितनी कठिन कसौटियों से सफलतापूर्वक पार उतरे हैं और फिर भी महाराज को नहीं छोड़ा
है ।

संवत १८७६ में श्रीहरि ने जलझीलनी का उत्सव किया । संतों के साथ जलक्रीड़ा करने के बाद महाराज ने सभा की । इतने में दूर से एक संत को आते देखा । उन्होंने पास आकर महाराज को दंडवत किए । परंतु दंडवत ठीक से नहीं कर सके । धीरे-धीरे महाराज के पास आए और चरणों में सिर रखकर रोने लगे । महाराज ने उनके मस्तक पर दो हाथ रखकर शांत किया । फिर पूछा, “साधुराम ! आपको क्या हुआ है ?” उन्होंने महाराज से कहा, “महाराज ! मेरे जीव में से या तो आपके स्वरूप का निश्चय निकाल दीजिए और या तो मुझे आपके पास सत्संग में रखिए ।” उनकी यह व्याकुलता देखकर महाराज ने कहा, “साधुराम ! हमारे स्वरूप का निश्चय आपके अंतर से निकाल देना वह हमारे हाथ में नहीं है । वह तो कुसंगियों का काम है । उसके लिए आपको यहां आने की ज़रूरत नहीं है ।”

यह सुनकर स्वामी फिर रोने लगे । उनसे खड़ा भी नहीं रहा जा रहा था इसलिए अचानक नीचे गिर पड़े । उनके शरीर पर से वस्त्र खिसक गया । उनके पूरे शरीर पर बाहर आ गए मांस के लोथड़े दिख रहे थे । महाराज तुरंत खड़े हो गए और उनके पास बैठ गए और धीरे से पूछा, “साधुराम ! यह क्या हुआ ? पूरे शरीर को यह उपाधि किसने की ? किसने ऐसा कहर किया ?”

स्वामी ने कहा, “महाराज, एक छोटे गांव में परोक्ष का स्थान था । वहां रात को दस बजे मैं पहुंचा और वहीं रहने का निश्चय किया । झोली लटकाकर मैं स्वामिनारायण... स्वामिनारायण... इस प्रकार आपका भजन करने लगा । वह सुनकर वहां ठहरे हुए दूसरे बैरागी मेरे पास आए और मुझसे पूछा, ‘तुम किसका साधु है और क्या भजन करते हो ?’ मैंने तो कहा, ‘मैं स्वामिनारायण भगवान का साधु हूं और उन्हीं का भजन करता हूं । यदि आपको पसंद न हो तो मन में भजन करूंगा ।’ पर वे तो स्वामिनारायण नाम सुनकर भड़क गए । मुझसे कहा, ‘स्वामिनारायण का भजन छोड़ दे, नहीं तो तुम को जला देगा ।’ पर महाराज, आपका हूं और आपका होकर ही मुझे जीना था इसलिए मैंने उनकी कोई बात नहीं सुनी । और एकांत में बैठकर स्वामिनारायण धुन करने लगा । इसलिए वे बहुत चिढ़ गए । उन्होंने भट्ठी में चिमटे रखकर बहुत तपाए और फिर मेरे पास आकर कहा, ‘बाबुडी ! स्वामिनारायण का नाम मत लेना, ये देखा ? अभी तुम को जला देगा ।’ मैंने फिर नाम मन में बोलना शुरू किया । पर मेरे होंठ फड़फड़ाते देखे इसलिए मुझे नीचे गिराकर लाल-तप्त हुए चिमटों से मेरे पूरे शरीर पर दाग देने लगे । उस दुःख से मुझसे ज़ोर से ‘स्वामिनारायण... स्वामिनारायण...’ बोल दिया जाता । इसलिए स्वामिनारायण नाम सुनकर वे फिर दाग देने लगे । फिर तो मुझे कुछ होश नहीं रहा । इसलिए वे सब अपनी जगह जाकर सो गए । सुबह हुई । मैं होश में आया और सीधा गढपुर आपके पास पहुंचा हूं ।”

महाराज की आंखों से आंसू बहने लगे । महाराज के हाथ इस साधु के शरीर पर फिरने लगे । अचानक महाराज ने कहा, “इस साधु का बिस्तर हमारी अक्षरओरडी पास ही करवाओ । हम उनकी सेवा में रहेंगे ।” यह सुनकर सद्. नित्यानंद स्वामी, सद्. ब्रह्मानंद स्वामी आदि संत बोल उठे, “महाराज ! आप कहेंगे उस प्रकार हम स्वामी की सेवा करेंगे । आपको क्यों तकलीफ लेनी चाहिए ?” महाराज ने करुण स्वर में कहा, “मुझे तकलीफ नहीं है, मुझे व्यथा है स्वामी ! ये दाग हमारे शरीर पर पड़े हैं । इतने दाग देने के बावजूद इस साधु ने हमें नहीं छोड़ा है तो अब हम उन्हें कैसे छोड़ें ? हम उनके पास ही रहेंगे, उनकी सेवा करेंगे । उनकी व्यथा मिटेगी तभी हमारे अंतर में शांति होगी ।”

इन साधुराम पर कितनी विकट स्थिति-परिस्थिति आई फिर भी महाराज को नहीं छोड़ा । महाराज के होकर ही रहे । महाराज के होकर ही जिए तो महाराज के अंतर का राज़ीपा कमा सके । वैसे ही हमें भी देह के सगे-संबंधियों के, विरोधियों के कटु वचन सुनने के कदाचित संयोग आएं फिर भी महाराज और सत्पुरुष को न छोड़े । केवल एक महाराज और सत्पुरुष के वफादार रहकर उनके होकर ही जीवन जीए ।

सौराष्ट्र प्रदेश के जेतपुर गांव में जीवा जोशी नाम के एक पवित्र ब्राह्मण रहते
थे । वे श्रीजीमहाराज के अनन्य उपासक, संपूर्ण आज्ञापालक, निर्भय भक्त थे । इष्टदेव की छोटी से छोटी आज्ञा को भी आदर से सावधानीपूर्वक पालते और अपने स्त्री-पुत्र आदि सभी परिवारजनों में भी उन्होंने सत्संग के गहरे संस्कार लगातार सावधानी रखकर डाले थे । और हमेशा भगवत् कथावार्ता सुनाकर उन्हें सत्संग की उत्तम दृढ़ता कराई थी । उन्होंने अपने संपर्क में आने वाले कईं लोगों को बुरी आदतें छुड़वाकर सदाचारी बनाया था ।

जीवा जोशी की धर्म-नियम पालन की दृढ़ता, सत्संग का बल और आर्थिक स्थिति बहुत कमज़ोर होने के बावजूद बहुत संतोषपूर्वक निश्चित रूप से आनंद में रहने की आदत देखकर कुछ कम समझ वाले लोग तथा सगे-संबंधी ईर्ष्या भाव रखकर उन्हें हर बार मुश्किल में डालते । स्वामिनारायण भगवान और स्वामिनारायण संप्रदाय का धर्म छुड़वाने की कोशिश करते । फिर भी जाति और गांव के लोगों की कठिन कसौटी भी सहन करके उन्होंने सिर के बदले (प्राणों की बाज़ी लगाकर) सत्संग रखा था । समाज में घर कर गए प्याज, लहसुन आदि तामसी आहार तथा गांजा, भांग, अफीम और तंबाकू इत्यादि व्यसन जो विशेष रूप से त्याज्य माने गए हैं, वे जीवा जोशी कभी खाते-पीते नहीं थे । सात्त्विक आहार के अलावा वे कोई भी वस्तु उपयोग में नहीं लेते थे । अपने सगे-संबंधियों में त्यौहारों पर भोजन का अवसर आए तब तथा विवाह या मृत्यु के प्रसंग में अथवा ब्राह्मणों की चौरासी आदि के भोजन प्रसंगों में भोजन करने जाना पड़े तब दाल-सब्जी आदि वस्तुओं में लहसुन, प्याज या हींग हो तो किसी को कुछ भी बताए बिना केवल लड्डू खा लेते थे । धीरे-धीरे यह बात जब दूसरे लोगों के पूरी तरह ध्यान में आई तब कुछ जल्दबाज़ स्वभाव के द्वेषी लोग जो मन में आए वैसा बोलकर बार-बार परेशान करते और जीवा जोशी के साथ बैर रखकर निंदा करने लगे । परंतु वे तो मौन रहकर शांति से भजन-स्मरण करते थे इसलिए उन लोगों का कुछ चलता नहीं था ।

एक बार श्रीजीमहाराज जेतपुर पधारे तब जीवा जोषी पुत्रों सहित पैर छुकर सभा में बैठे तो महाराज ने कहा, “ये आपके बेटे बड़े हो गए हैं फिर भी जनेऊ क्यों नहीं दी ?” जोशी ने कहा, “आर्थिक स्थिति कमज़ोर है । अभी देश-काल भी अनुकूल नहीं है ।” महाराज ने तुरंत ही पूछा, “जनेऊ देने में कितना खर्च होता
है ?” तब उन्होंने कहा, “यदि साधारण करें तो दो सौ कोरी खर्च होता है और अच्छा करें तो पांच सौ कोरी लगता है ।” फिर एक गुणबुद्धिवाले व्यापारी दर्शन करने आए । उन्हें महाराज ने सिफारिश की कि, “हमारे खाते में लिखकर आपकी दुकान से जो चाहिए वह पांच सौ कोरी तक का माल इन जीवा जोशी को देंगे ?” तो सेठ ने हां कहा । फिर दूसरे दिन महाराज ने दोनों भाइयों को विधिपूर्वक जनेऊ दी । इस अवसर पर सभी सगे-संबंधियों को भोजन के लिए निमंत्रण पहले से दिए थे जो सभी ने स्वीकार किए थे परंतु भोजन का समय हुआ तब गहरी ईर्ष्या के कारण कोई भोजन करने नहीं आया । तब महाराज ने न आने का कारण पूछा तो किसी ने कहा कि, “एक ग्रंथ में लिखा है कि, जिस लड़के को दूसरे ने जनेऊ दी हो उस लड़के के हाथ का श्राद्ध उसके पिता को नहीं पहुंचता पर जनेऊ देने वाले को मिलता है ।” तब महाराज ने कहा, “हमें जो मिलेगा वह पूरे जगत को पहुंच
जाएगा ।” यह बात सुनकर जाति के लोग चले गए पर भोजन करने नहीं बैठे । फिर रसोई तैयार थी वह साधु, पार्षद तथा सत्संगियों को खिला दी और गरीब लोगों को खिलाया । परंतु जाति के लोगों के मोह (मुहब्बत) में आकर श्रीजीमहाराज को नहीं छोड़ा । क्योंकि, दृढ़ था कि उन्हीं के होकर ही सदा जीना है ।



 

स्व-अध्ययन

  1. महाराज और सत्पुरुष के लिए कभी ढीला शब्द न सुन लेकर क्या हम कड़ा जवाब दे सकते हैं ?
  2. सत्संग में मान-अपमान हो तो कभी दूर न होते हुए कल्याण की गरज रखकर संतों-भक्तों से अधिक से अधिक निकट रहने के आग्रही बनते हैं ?
  3. कितनी भी मुश्किल आए, विपरीत संयोग आए उसमें कभी महाराज और सत्पुरुष को नहीं छोड़कर उनके साथ जीव जोड़कर उनके सान्निध्य में ही रहने की गरज रहती है ?
  4. हमेशा महाराज और सत्पुरुष का वफादार रहा जाता है ?
  5. सत्पुरुष के लिए कोई गलत बोले तो सत्पुरुष के स्वरूप में निःसंशयपना रहता है ?

दृढ़ संकल्प करें कि,

मिले हुए महाराज और सत्पुरुष से अधिक स्नेह-प्रीति किसी और में नहीं ही होने देनी है ।