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कलम

उनकी आज्ञा और अनुवृत्ति में ही सदा रहूंगा

सूर्य उदय हो तो दीपक या मशाल की जरूरत नहीं रहती । बारिश हो तब बोर (बोरवेल) से पानी निकालने की जरूरत नहीं रहती । 

जहाज में बैठे उसे तूंबड़े (तैरने का साधन) बांधने की जरूरत नहीं रहती ।

वैसे ही भगवान और संत की आज्ञा और अनुवृत्ति में जो बर्तते हैं उन्हें दूसरे साधन अपने आप सिद्ध हो जाते हैं ।

एक बड़े संत के पास एक हरिभक्त ने आकर बात की कि, “वह भक्त तो धारणा-पारणा करते हैं, भूमि पर सोते हैं, मीठा-चिकना (मिष्ठान-तली हुई वस्तुएं) नहीं खाते हैं, दस घंटे ध्यान करते हैं ।” यह सुनकर बड़े संत मंद-मंद हंसते हुए एक मर्म वाक्य बोले, “हां, पर वे यह सब किसकी आज्ञा से करते हैं ?” अर्थात किसके कहने से करते हैं ? खुद से ही ना !! अर्थात् अनंत साधन करें परंतु मनमुखी होकर करें तो उसका फल शून्य है । जबकि भगवान और संत की आज्ञा में रहकर थोड़े साधन, भक्ति, सेवा करें तो उसका फल अनंतगुना मिलता है ।

इस प्रकार, श्रीजीमहाराज तथा सत्पुरुष की आज्ञा में टुक-टुक (पूर्णतः समर्पित) होकर रहे वही श्रेष्ठ भक्त है । उसमें भी उनकी रुचि यानी अनुवृत्ति में रहकर आज्ञापालन करना वह तो पराकाष्ठा की बात हुई । 

आज्ञा समय, स्थान, संयोग, स्थिति-परिस्थिति और व्यक्ति के अनुसार बदलती रहती है । जबकि अनुवृत्ति त्रिकालाबाधित होती है । किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी भी समय, किसी भी स्थान पर और किसी भी परिस्थिति में एक ही जैसी होती है । अर्थात् अनुवृत्ति में आज्ञा आ जाती है परंतु आज्ञा में अनुवृत्ति न भी
आए । आज्ञा की तुलना में अनुवृत्ति का पालन करना श्रेष्ठ है । इसीलिए इस कलम में आज्ञा और अनुवृत्ति दोनों शब्द समाहित कर लिए गए हैं ।

अ.मु. काशीरामभाई को कुमारावस्था में श्री निर्गुणदासजी स्वामी ने वर्तमान धराएं थे और सिर पर हस्त रखकर आशीर्वाद दिए थे कि, “बहुत बड़े मुक्त
बनोगे ।” 

ई.स. १८९२ में मुंबई और पूना में उच्च शिक्षा प्राप्त कर वे लुणावाड़ा आए । उस समय लुणावाड़ा के राजा वखतसिंहजी ने पांच सौ रुपये वेतन के अलावा अनेक सुविधाओं और अधिकार के साथ काशीरामभाई को दीवान पद ग्रहण करने की बिनती की । तब काशीरामभाई ने कहा, “मुझे क्षमा करें । मेरा जीवनध्येय तो मेरे गुरु सद्. निर्गुणदासजी स्वामी की आज्ञा से कब का मैंने तय कर रखा है ।” 

उनके पिता सेवकराम पुत्र की ऐसी गंभीर भूल से नाराज हुए थे । उसी समय मोरबी के ठाकुरजी सर वाघजी का पत्र भी मिला, “हमारी बहन स्व. वखतुबा की स्मृति में यहां विद्यालय शुरू कर रहे हैं । उस विद्यालय के आचार्य बनें । उसके लिए मासिक दो सौ पचास रुपये वेतन तथा अन्य सुविधाएं प्रदान करेंगे ।”

काशीरामभाई ने कहा, “पिताजी, हम अहमदाबाद जाकर हमारे समर्थ गुरु सद्. निर्गुणदासजी स्वामी की अनुमति ले आते हैं ।” 

सद्. निर्गुणदासजी स्वामी ने काशीरामभाई को आज्ञा दी कि, “लुणावाड़ा के दीवान बनने के प्रतिष्ठा के महापद के बदले आप सद् विद्या की सेवा का कार्य स्वीकार करें ।” यह सुनकर उनके पिता चिंतित हुए कि, ‘मोरबी दूर है । उसका ध्यान कौन रखेगा ?’ इसलिए अंतर्यामीपन से स्वामी ने कहा, “सेवकराम, मोरबी दूर है । वहां सत्संग का सुख यहां जैसा नहीं है । वहां काशीराम का ध्यान स्वयं महाराज रखेंगे । इसलिए उसकी चिंता न करें । हम काशीराम को हमारी पूजा में रहे श्री घनश्याम महाराज का स्वरूप है वह देते हैं । वह स्वरूप उसकी खबर (ध्यान) रखेगा ।”

सद्. निर्गुणदासजी स्वामी ने काशीरामभाई को घनश्याम महाराज की मूर्ति देकर, प्रसादी का हार पहनाया और सिर पर हस्त रखा । 

पिता-पुत्र जब मंदिर से बाहर निकले तब जिस पेटी में घनश्याम महाराज रखे थे, वह पेटी काशीरामभाई ने अपने सिर पर रखी थी । गुरुआज्ञा को शिरोधार्य करने वाले काशीरामभाई ने १३ अप्रैल, १८९२ के दिन वखतुबा चैरिटेबल विद्यालय के आचार्य पद का कार्यभार संभाल लिया । दो साल के कम समय में ही वखतुबा विद्यालय की गणना श्रेष्ठ श्रेणी में होने लगी । गुरुआज्ञा को तत्काल ग्रहण करने वाले काशीरामभाई की इस लोक में तो ख्याति बहुत हुई परंतु परभाव की भी उच्च मुक्त स्थिति को पाकर श्रीहरि के साथ निरंतर दिव्यभाव से बातें करते थे ।

हमें भी काशीरामभाई की तरह जीवन का महत्त्वपूर्ण निर्णय सत्पुरुष तथा पू. संतों से पूछकर लेना चाहिए । एक बार सत्पुरुष या पू. संतों की ओर से मिले निर्णय या आज्ञा को तत्परता से ग्रहण कर उनका राज़ीपा कमाएं । 

यह हुए भूतकाल के प्रसंग । वर्तमानकाल में महाराज और सत्पुरुष की आज्ञा-अनुवृत्ति में रहकर सत्पुरुष के अंतर का राज़ीपा कमा रहे मुमुक्षु पात्र के जीवन से प्रेरणा लें । 

घनश्यामनगर के युवक मुक्त राजुभाई चंदुभाई पटेल को प्यारे गुरुजी ने नियम दिया था कि, ‘युवक सभा में नियमित हाज़िर रहना । कैसे भी संयोग आएं फिर भी छुट्टी मत रखना ।’ वे गुरुजी की आज्ञा का दृढ़ता से पालन करते थे ।

दिनांक १-१२-१९९९, शनिवार के दिन सुबह उनके विवाह थे । शाम को रिसेप्शन था । इसी दिन रात को मंदिर में साप्ताहिक (युवक) सभा थी । उन्होंने मन में निश्चय कर लिया था कि, ‘मुझे गुरुजी द्वारा दिया गया नियम तोड़ना नहीं
है । मैं सभा में जाऊंगा ही । भले ही विवाह का दिन हो !’ रिसेप्शन का समय शाम ७ से ९ का था । ९ बजने में पांच मिनट शेष थे और वे किसी को बताए बिना ही सूट बदलकर श्वेत वस्त्र धारण कर अपने विवाह के रिसेप्शन का प्रोग्राम छोड़कर मंदिर में सभा में हाज़िरी देने पहुंच गए ।

गुरुआज्ञा में बर्तने की कितनी लगन !!

एक बार प्यारे गुरुजी कनाडा में विचरण में थे । गुरुजी ने कनाडा से अटलांटा निवासी प.भ. रमेशभाई सुहागिया को पत्र लिखकर आज्ञा दी कि, “रमेशभाई, हम पांच दिन अमेरिका-अटलांटा आने वाले हैं पर वास्तव में लाभ लेना हो तो इन तारीखों में कनाडा आ जाओ ।” उन तारीखों में रमेशभाई की इंडिया में मुंबई में एक बड़े कॉन्ट्रैक्ट की बहुत महत्त्वपूर्ण मीटिंग तय हो चुकी थी । जिस कॉन्ट्रैक्ट से बिजनेस में करोड़ों का फायदा होने वाला था । फिर भी गुरुजी ने अधिकार से लिखा था कि, “इन दिनों में कनाडा पधारना ।” उन्होंने गुरुजी का आज्ञापत्र पढ़कर मुंबई की तारीख बदलने के लिए प्रयास शुरू किए । महाराज कर्ता बने और प्रोग्राम बदल दिया । मीटिंग की तारीख बदल गई । उन्होंने चार-पांच दिन पहले गुरुजी को फोन करके बता दिया कि, “गुरुजी, मैं अगले दिन कनाडा पहुंच जाऊंगा ।” गुरुजी कनाडा पधारे उसके अगले दिन वे कनाडा गुरुजी का लाभ लेने पहुंच गए । उन्हें कनाडा लाभ लेने आए देख गुरुजी ने उन्हें गले लगाकर बहुत राज़ीपा दिया था । गुरुजी द्वारा एक बार बताई गई अनुवृत्ति का जीवनभर पालन करने वाले पात्रों के जीवन से  रुचिकर पात्र बनने की प्रेरणा पाएं ।

ई.स. २००८ में दिव्यजीवन सेवक शिविर में प्यारे गुरुजी ने दिव्यजीवन प्रथा में जुड़े हरिभक्तों को अपनी रुचि बताते हुए कहा था कि, “सभी हरिभक्त श्वेत वस्त्र पहनें तो महाराज बहुत राज़ी होंगे ।” गुरुजी की रुचि सुनकर जिन्होंने श्वेत वस्त्र पहनने का नियम लिया उन्हें सभा में खड़ा करके गुरुजी ने बहुत राज़ीपा दिया । 

जिसमें नरोड़ा क्षेत्र के जिगरभाई हरिभाई पटेल भी खड़े हुए । उन्होंने श्वेत वस्त्र पहनने का नियम तो लिया ही, परंतु अपने देह को सजाने के लिए कभी सोना न पहनने का नियम भी लिया ।

दिनांक २१-३-२००९ के दिन उनके विवाह थे । विवाह के दिन भी उनका यह नियम अडिग रहा । रजोगुणी वस्त्र परिधान न करते हुए श्वेत सूट पहनकर ही विवाह में जाने को कहा । तथा अंगूठी, चेन आदि सोना भी न पहनने के लिए कहा । परिवार के सदस्यों ने आग्रह किया कि, “विवाह के दिन तो छूट होती है । एक दिन पहनने में कोई हर्ज नहीं ।” परंतु उनके मुख से एक ही आवाज थी, “गुरुजी की रुचि नहीं है ।” और वास्तव में वे किसी भी प्रकार का सोना पहने बिना मात्र श्वेत सूट पहनकर अपने विवाह में गए । उनकी सात्त्विकता और रुचि में बर्तने की लगन देखकर गुरुजी अंतर से बहुत राज़ी हो गए थे ।

इस प्रकार, हमें भी इन सभी प्रसंगों को लक्ष्य बनाकर अखंड महाराज की रुचि में बर्तने का आग्रह रखना चाहिए ।

 

स्व-अध्ययन 

  1. सत्पुरुष और पू. संत जो भी आज्ञा दें उसे हम तत्परता से ग्रहण करते हैं ?

 

२. सत्पुरुष या पू. संत जब आज्ञा करे तब क्या समय-संयोग की ओर देखते है ?

  ३. धर्मादा ५% या १०% नियमित निकालता हूं ?

४. गुरुजी की रुचि के अनुसार रोज सुबह दो घंटे एकांत के लिए समय निकालता  हूं ?

५. गुरुजी की रुचि के अनुसार फैशनेबल बाल तथा दाढ़ी के स्थान पर साधारण बाल तथा दाढ़ी रखता हूं ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि

मेरा देह, धन, कुटुंब-परिवार सर्वस्व भगवान और संत के लिए ही कर रखना
है ।

कलम

उनकी आज्ञा और अनुवृत्ति में ही सदा रहूंगा

सूर्य उदय हो तो दीपक या मशाल की जरूरत नहीं रहती । बारिश हो तब बोर (बोरवेल) से पानी निकालने की जरूरत नहीं रहती । 

जहाज में बैठे उसे तूंबड़े (तैरने का साधन) बांधने की जरूरत नहीं रहती ।

वैसे ही भगवान और संत की आज्ञा और अनुवृत्ति में जो बर्तते हैं उन्हें दूसरे साधन अपने आप सिद्ध हो जाते हैं ।

एक बड़े संत के पास एक हरिभक्त ने आकर बात की कि, “वह भक्त तो धारणा-पारणा करते हैं, भूमि पर सोते हैं, मीठा-चिकना (मिष्ठान-तली हुई वस्तुएं) नहीं खाते हैं, दस घंटे ध्यान करते हैं ।” यह सुनकर बड़े संत मंद-मंद हंसते हुए एक मर्म वाक्य बोले, “हां, पर वे यह सब किसकी आज्ञा से करते हैं ?” अर्थात किसके कहने से करते हैं ? खुद से ही ना !! अर्थात् अनंत साधन करें परंतु मनमुखी होकर करें तो उसका फल शून्य है । जबकि भगवान और संत की आज्ञा में रहकर थोड़े साधन, भक्ति, सेवा करें तो उसका फल अनंतगुना मिलता है ।

इस प्रकार, श्रीजीमहाराज तथा सत्पुरुष की आज्ञा में टुक-टुक (पूर्णतः समर्पित) होकर रहे वही श्रेष्ठ भक्त है । उसमें भी उनकी रुचि यानी अनुवृत्ति में रहकर आज्ञापालन करना वह तो पराकाष्ठा की बात हुई । 

आज्ञा समय, स्थान, संयोग, स्थिति-परिस्थिति और व्यक्ति के अनुसार बदलती रहती है । जबकि अनुवृत्ति त्रिकालाबाधित होती है । किसी भी व्यक्ति के लिए, किसी भी समय, किसी भी स्थान पर और किसी भी परिस्थिति में एक ही जैसी होती है । अर्थात् अनुवृत्ति में आज्ञा आ जाती है परंतु आज्ञा में अनुवृत्ति न भी
आए । आज्ञा की तुलना में अनुवृत्ति का पालन करना श्रेष्ठ है । इसीलिए इस कलम में आज्ञा और अनुवृत्ति दोनों शब्द समाहित कर लिए गए हैं ।

अ.मु. काशीरामभाई को कुमारावस्था में श्री निर्गुणदासजी स्वामी ने वर्तमान धराएं थे और सिर पर हस्त रखकर आशीर्वाद दिए थे कि, “बहुत बड़े मुक्त
बनोगे ।” 

ई.स. १८९२ में मुंबई और पूना में उच्च शिक्षा प्राप्त कर वे लुणावाड़ा आए । उस समय लुणावाड़ा के राजा वखतसिंहजी ने पांच सौ रुपये वेतन के अलावा अनेक सुविधाओं और अधिकार के साथ काशीरामभाई को दीवान पद ग्रहण करने की बिनती की । तब काशीरामभाई ने कहा, “मुझे क्षमा करें । मेरा जीवनध्येय तो मेरे गुरु सद्. निर्गुणदासजी स्वामी की आज्ञा से कब का मैंने तय कर रखा है ।” 

उनके पिता सेवकराम पुत्र की ऐसी गंभीर भूल से नाराज हुए थे । उसी समय मोरबी के ठाकुरजी सर वाघजी का पत्र भी मिला, “हमारी बहन स्व. वखतुबा की स्मृति में यहां विद्यालय शुरू कर रहे हैं । उस विद्यालय के आचार्य बनें । उसके लिए मासिक दो सौ पचास रुपये वेतन तथा अन्य सुविधाएं प्रदान करेंगे ।”

काशीरामभाई ने कहा, “पिताजी, हम अहमदाबाद जाकर हमारे समर्थ गुरु सद्. निर्गुणदासजी स्वामी की अनुमति ले आते हैं ।” 

सद्. निर्गुणदासजी स्वामी ने काशीरामभाई को आज्ञा दी कि, “लुणावाड़ा के दीवान बनने के प्रतिष्ठा के महापद के बदले आप सद् विद्या की सेवा का कार्य स्वीकार करें ।” यह सुनकर उनके पिता चिंतित हुए कि, ‘मोरबी दूर है । उसका ध्यान कौन रखेगा ?’ इसलिए अंतर्यामीपन से स्वामी ने कहा, “सेवकराम, मोरबी दूर है । वहां सत्संग का सुख यहां जैसा नहीं है । वहां काशीराम का ध्यान स्वयं महाराज रखेंगे । इसलिए उसकी चिंता न करें । हम काशीराम को हमारी पूजा में रहे श्री घनश्याम महाराज का स्वरूप है वह देते हैं । वह स्वरूप उसकी खबर (ध्यान) रखेगा ।”

सद्. निर्गुणदासजी स्वामी ने काशीरामभाई को घनश्याम महाराज की मूर्ति देकर, प्रसादी का हार पहनाया और सिर पर हस्त रखा । 

पिता-पुत्र जब मंदिर से बाहर निकले तब जिस पेटी में घनश्याम महाराज रखे थे, वह पेटी काशीरामभाई ने अपने सिर पर रखी थी । गुरुआज्ञा को शिरोधार्य करने वाले काशीरामभाई ने १३ अप्रैल, १८९२ के दिन वखतुबा चैरिटेबल विद्यालय के आचार्य पद का कार्यभार संभाल लिया । दो साल के कम समय में ही वखतुबा विद्यालय की गणना श्रेष्ठ श्रेणी में होने लगी । गुरुआज्ञा को तत्काल ग्रहण करने वाले काशीरामभाई की इस लोक में तो ख्याति बहुत हुई परंतु परभाव की भी उच्च मुक्त स्थिति को पाकर श्रीहरि के साथ निरंतर दिव्यभाव से बातें करते थे ।

हमें भी काशीरामभाई की तरह जीवन का महत्त्वपूर्ण निर्णय सत्पुरुष तथा पू. संतों से पूछकर लेना चाहिए । एक बार सत्पुरुष या पू. संतों की ओर से मिले निर्णय या आज्ञा को तत्परता से ग्रहण कर उनका राज़ीपा कमाएं । 

यह हुए भूतकाल के प्रसंग । वर्तमानकाल में महाराज और सत्पुरुष की आज्ञा-अनुवृत्ति में रहकर सत्पुरुष के अंतर का राज़ीपा कमा रहे मुमुक्षु पात्र के जीवन से प्रेरणा लें । 

घनश्यामनगर के युवक मुक्त राजुभाई चंदुभाई पटेल को प्यारे गुरुजी ने नियम दिया था कि, ‘युवक सभा में नियमित हाज़िर रहना । कैसे भी संयोग आएं फिर भी छुट्टी मत रखना ।’ वे गुरुजी की आज्ञा का दृढ़ता से पालन करते थे ।

दिनांक १-१२-१९९९, शनिवार के दिन सुबह उनके विवाह थे । शाम को रिसेप्शन था । इसी दिन रात को मंदिर में साप्ताहिक (युवक) सभा थी । उन्होंने मन में निश्चय कर लिया था कि, ‘मुझे गुरुजी द्वारा दिया गया नियम तोड़ना नहीं
है । मैं सभा में जाऊंगा ही । भले ही विवाह का दिन हो !’ रिसेप्शन का समय शाम ७ से ९ का था । ९ बजने में पांच मिनट शेष थे और वे किसी को बताए बिना ही सूट बदलकर श्वेत वस्त्र धारण कर अपने विवाह के रिसेप्शन का प्रोग्राम छोड़कर मंदिर में सभा में हाज़िरी देने पहुंच गए ।

गुरुआज्ञा में बर्तने की कितनी लगन !!

एक बार प्यारे गुरुजी कनाडा में विचरण में थे । गुरुजी ने कनाडा से अटलांटा निवासी प.भ. रमेशभाई सुहागिया को पत्र लिखकर आज्ञा दी कि, “रमेशभाई, हम पांच दिन अमेरिका-अटलांटा आने वाले हैं पर वास्तव में लाभ लेना हो तो इन तारीखों में कनाडा आ जाओ ।” उन तारीखों में रमेशभाई की इंडिया में मुंबई में एक बड़े कॉन्ट्रैक्ट की बहुत महत्त्वपूर्ण मीटिंग तय हो चुकी थी । जिस कॉन्ट्रैक्ट से बिजनेस में करोड़ों का फायदा होने वाला था । फिर भी गुरुजी ने अधिकार से लिखा था कि, “इन दिनों में कनाडा पधारना ।” उन्होंने गुरुजी का आज्ञापत्र पढ़कर मुंबई की तारीख बदलने के लिए प्रयास शुरू किए । महाराज कर्ता बने और प्रोग्राम बदल दिया । मीटिंग की तारीख बदल गई । उन्होंने चार-पांच दिन पहले गुरुजी को फोन करके बता दिया कि, “गुरुजी, मैं अगले दिन कनाडा पहुंच जाऊंगा ।” गुरुजी कनाडा पधारे उसके अगले दिन वे कनाडा गुरुजी का लाभ लेने पहुंच गए । उन्हें कनाडा लाभ लेने आए देख गुरुजी ने उन्हें गले लगाकर बहुत राज़ीपा दिया था । गुरुजी द्वारा एक बार बताई गई अनुवृत्ति का जीवनभर पालन करने वाले पात्रों के जीवन से  रुचिकर पात्र बनने की प्रेरणा पाएं ।

ई.स. २००८ में दिव्यजीवन सेवक शिविर में प्यारे गुरुजी ने दिव्यजीवन प्रथा में जुड़े हरिभक्तों को अपनी रुचि बताते हुए कहा था कि, “सभी हरिभक्त श्वेत वस्त्र पहनें तो महाराज बहुत राज़ी होंगे ।” गुरुजी की रुचि सुनकर जिन्होंने श्वेत वस्त्र पहनने का नियम लिया उन्हें सभा में खड़ा करके गुरुजी ने बहुत राज़ीपा दिया । 

जिसमें नरोड़ा क्षेत्र के जिगरभाई हरिभाई पटेल भी खड़े हुए । उन्होंने श्वेत वस्त्र पहनने का नियम तो लिया ही, परंतु अपने देह को सजाने के लिए कभी सोना न पहनने का नियम भी लिया ।

दिनांक २१-३-२००९ के दिन उनके विवाह थे । विवाह के दिन भी उनका यह नियम अडिग रहा । रजोगुणी वस्त्र परिधान न करते हुए श्वेत सूट पहनकर ही विवाह में जाने को कहा । तथा अंगूठी, चेन आदि सोना भी न पहनने के लिए कहा । परिवार के सदस्यों ने आग्रह किया कि, “विवाह के दिन तो छूट होती है । एक दिन पहनने में कोई हर्ज नहीं ।” परंतु उनके मुख से एक ही आवाज थी, “गुरुजी की रुचि नहीं है ।” और वास्तव में वे किसी भी प्रकार का सोना पहने बिना मात्र श्वेत सूट पहनकर अपने विवाह में गए । उनकी सात्त्विकता और रुचि में बर्तने की लगन देखकर गुरुजी अंतर से बहुत राज़ी हो गए थे ।

इस प्रकार, हमें भी इन सभी प्रसंगों को लक्ष्य बनाकर अखंड महाराज की रुचि में बर्तने का आग्रह रखना चाहिए ।

 

स्व-अध्ययन 

  1. सत्पुरुष और पू. संत जो भी आज्ञा दें उसे हम तत्परता से ग्रहण करते हैं ?

 

२. सत्पुरुष या पू. संत जब आज्ञा करे तब क्या समय-संयोग की ओर देखते है ?

  ३. धर्मादा ५% या १०% नियमित निकालता हूं ?

४. गुरुजी की रुचि के अनुसार रोज सुबह दो घंटे एकांत के लिए समय निकालता  हूं ?

५. गुरुजी की रुचि के अनुसार फैशनेबल बाल तथा दाढ़ी के स्थान पर साधारण बाल तथा दाढ़ी रखता हूं ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि

मेरा देह, धन, कुटुंब-परिवार सर्वस्व भगवान और संत के लिए ही कर रखना
है ।