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कलम

महाराज के लिए ही मेरा जन्म है

“स्त्री-द्रव्य और बेटे के लिए, जो जीये वह जीव कहलाए...”

जीवनभर देह, पुत्र, परिवार के लिए न्योछावर हो जाए उसे कहा जाता है
जीव । देशसेवा और जनहित के लिए न्योछावर हो जाए उसे कहा जाता है शहीद और श्रीजीमहाराज तथा सत्पुरुष के लिए तन, मन, धन न्योछावर करे उसे कहा जाता है सच्चा शिष्य । ऐसे सच्चे शिष्य ही मोक्षपद को प्राप्त कर सकते हैं । 

गढ़डा मध्य के ६२वें वचनामृत में रघुवीरजी महाराज ने प्रश्न पूछा है कि, “हे महाराज ! इस जीव का मोक्ष वह क्या करने से होता है ?” तब श्रीजीमहाराज ने उत्तर दिया है कि, “जिसे अपने कल्याण की इच्छा हो उसे अपना जो देह, धन, धाम, कुटुंब, परिवार उन सभी को भगवान की सेवा में जोड़ देना चाहिए और भगवान की सेवा में जो पदार्थ काम न आए तो उसका त्याग कर देना चाहिए । ऐसी रीति से जो भगवान परायण बर्तता है वह गृहस्थाश्रमी हो, तो भी मरते समय भगवान के धाम में नारद-सनकादिक की (मुक्त की) पंक्ति में मिलता है, और परम मोक्ष को पाता है वही उसका उत्तर है ।” 

ऐसे आत्मकल्याण के प्यासे तीन हजार संत और लाखों हरिभक्त भगवान स्वामिनारायण के शरणागत सेवक थे । जिन्होंने एकमात्र भगवान स्वामिनारायण हेतु अपना तन, मन, धन सर्वस्व अर्पण कर रखा था । उनके जीवन का यह मंत्र बन गया था कि, ‘महाराज के लिए ही मेरा जन्म है ।’

एक बार श्रीजीमहाराज ने ऐसा प्रकरण शुरू किया था कि, सत्संगी बंधुओं में जिसे भी दो बेटे हों उनमें से एक-एक को चिट्ठी लिखकर बुलाते और कहते, “हमें एक को साधु करना है ।” 

डांगरवा गांव के अगरोजी और अमरोजी दोनों भाइयों ने यह जाना । उन्होंने तय किया कि, “कभी भी हमारे ऊपर भी यह चिट्ठी आए । इसलिए हमें उस तरह से तैयार रहना चाहिए । सद्. गुणातीतानंद स्वामी ने कहा है कि, ‘अधिक द्रव्य, अच्छा घर और रूपवान स्त्री ये तीन जिसके पास हों वह कभी भगवान में जुड़ नहीं सकता ।’ इसलिए यह घर बेच देते हैं । कहीं महाराज हमें बुलाएं और कहीं इस घर का बंधन हो जाए तो ??” ऐसा सोचकर दोनों भाई घर बेचकर झोपड़ी जैसा घर बनाकर उसमें रहने लगे । जो पैसे आए वे गढ़पुर महाराज के पास भेज दिए । रोज राह देखते कि कब महाराज की चिट्ठी आए और महाराज की सेवा में जाएं । 

एक बार दोनों भाई घर पर थे । मातृश्री बाहर गएं थे । उसी वक्त महाराज की चिट्ठी आई, ‘दो में से एक भाई सेवा में आ जाओ ।’ लेकिन दोनों भाई जाने के लिए तैयार हो गए । अगरोजी ने कहा, “तू मां की सेवा करने रुक जा, मैं सेवा में गढ़पुर जाता हूं ।” अमरोजी ने कहा, “नहीं, मैं जाता हूं । तू मां की सेवा के लिए घर पर
रह ।” दोनों बेटों को इस तरह झगड़ते देख घर आए मातृश्री ने कहा, “बेटा, किसलिए झगड़ रहे हो ?” तब दोनों एक साथ बोल उठे, “मां... मां... गढ़पुर से महाराज की चिट्ठी आई है । चिट्ठी में लिखा है कि दो में से एक भाई आ जाओ, साधु करना है । इसलिए मां मैं जाऊं न ? यह यहां आपकी सेवा में रुकेगा ।” दोनों की महाराज के लिए जीने की तमन्ना देख उनके मातृश्री ने कहा, “बेटों, क्या तुम ऐसा मानते हो कि मैं तुम्हारे सहारे जीती हूं ? तुम्हारी सेवा की मुझे जरूरत पड़ेगी ? महाराज वैसी जरूरत नहीं ही पड़ने देंगे । मैं तो महाराज के सहारे जीती हूं । इसलिए मेरी चिंता बिल्कुल मत करना । जाओ, दोनों जाओ । और मेरी कोख से जन्मे हो तो साधु होकर अनंत का कल्याण करना । हमारा यह जन्म तो महाराज के लिए ही है ।” ऐसा कहकर कलेजे के टुकड़े समान दोनों बेटों को हंसते मुख से, धन्यता अनुभव करते हुए महाराज के पास गढ़पुर साधु होने के लिए भेज दिया ।

एक बार श्रीजीमहाराज पंचाला जा रहे थे । रास्ते में बालागाम आया । बालागाम के प्रेमीभक्त सुंदरमा के घर महाराज अचानक पधारे । महाराज को देखकर सुंदरमा देह का भान भूल गएं । सुंदरमा ने महाराज को खाट बिछाकर, रजाई बिछाकर उस पर विराजमान होने की प्रार्थना की और आनंद के अतिरेक में बोल उठे, “महाराज, मुझसे कुछ मांगिए; मैं आप पर बहुत राज़ी हुई हूं । आप जो मांगें वह मैं आपको दे दूं ।” श्रीजीमहाराज ने कहा, “सुंदरमा, आपकी जो सबसे प्यारी वस्तु हो वह हमें दीजिए ।” सुंदरमा घर में गएं और बहुत विचार किया : ‘इस संदूक में मैंने अपने पूरे जीवन की पूंजी सहेजकर रखी है; वह मुझे बहुत प्यारी
है । वही दे दूं ।’ जब पैसे लेने जाते हैं तब गाय रंभाई और सुंदरमा बोले, “हंअअअ... इस पूंजी से तो मुझे यह गाय बहुत प्यारी है । लाओ न वही दे दूं ।” जब सुंदरमा गाय छोड़ने जाते हैं तभी उनके दो बेटे प्रेमजी और देवजी खेत में गए थे वे दौड़ते हुए घर आए, “मां ओ मां... हमारे घर महाराज पधारे हैं ?!” इतना सुनते ही सुंदरमा को हुआ, ‘सबसे प्यारे तो मुझे मेरे ये दो बेटे हैं । इन्हें ही अर्पण कर दूं ।’ बेटे घर में आए कि तुरंत ही सुंदरमा दोनों बेटों को एक तरफ ले गएं और बात की, “बेटा प्रेमजी, बेटा देवजी, महाराज ने मेरी सबसे प्यारी वस्तु मांगी है । मेरे सबसे प्यारे तो तुम दोनों ही हो । मुझे तुम दोनों को महाराज को अर्पण करना है । उसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है न !” तभी दोनों बेटे एक साथ बोल उठे, “अरे यह क्या बोल रहे हो मां ? इसमें पूछना ही न हो । महाराज के लिए तो हमारा जीवन है । ऐसे ही पाठ आपने हमें बचपन से सिखाए हैं ।” बेटों के वचन सुनकर सुंदरमा बहुत राज़ी हो गएं । और दोनों बेटों का हाथ पकड़कर महाराज के पास ले गएं । दोनों के हाथ महाराज के हाथों में सौंपते हुए कहा, “महाराज लीजिए, ये दोनों मेरे सबसे प्यारे हैं । आज से आपको अर्पण । दोनों का स्वीकार करें महाराज ।” इन दोनों में आपके जैसे दिव्य कल्याणकारी गुण आएं और सहजानंदी सिंह बनें ऐसे दिव्य आशीर्वाद दीजिए महाराज ।” इतना कहकर सुंदरमा देहभान भूलकर नाचने और कूदने लगें । श्रीजीमहाराज ने दोनों बेटों को दीक्षा दी । देवजी को नाम दिया ‘दहरानंद स्वामी ।’ और प्रेमजी को नाम दिया, ‘प्रसादानंद स्वामी ।’

इस प्रकार, सुंदरमा की तरह हम भी अपने बेटा-बेटियों को बचपन से ही महाराज के लिए जीवन जीने की दिव्य प्रेरणा देकर सुंदरमा की तरह महाराज के अंतर का राज़ीपा कमा लें । 

धन्य है ऐसी माता को !! जिसने बचपन से ही कलेजे के टुकड़ों को महाराज के लिए जीने के पीयूष (अमृत) पिलाए है !!

आइए, “महाराज के लिए ही मेरा जन्म है” इस जीवनमंत्र को स्व-जीवन में लक्ष्यार्थ करने हेतु स्वाध्याय करें :

 

स्व-अध्ययन 

  1. महाराज ने दिया हुआ तन, मन और धन महाराज के उपयोग में अर्पण होता है ?
  2. महाराज के लिए ही मेरा जन्म है । स्वजीवन में इस समझ को दृढ़ कर, अपने बेटे-बेटियों को बचपन से दृढ़ करवाते हैं ?
  3. हमारा समय, शक्ति, बुद्धि, कौशल का महाराज के लिए विशेष रूप से उपयोग हो ऐसे प्रयास होते हैं ?
  4. एक निश्चित आयु के बाद घर-संसार से निवृत्त होकर अधिक समय मंदिर और संतों की सेवा में उपयोग हो ऐसा आयोजन करने के उपाय में रहा जाता हैं ? 

५. महाराज की आज्ञा के अनुसार नियमित रूप से समय का धर्मादा

   निकलता है ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि

रोज़ नियमित मैं कौन हूं ? किसलिए आया हूं ? मुझे क्या करना है ? और मैं क्या कर रहा हूं ? ऐसे चार प्रश्नों का मनन सहित चिंतन करें ही ।

कलम

महाराज के लिए ही मेरा जन्म है

“स्त्री-द्रव्य और बेटे के लिए, जो जीये वह जीव कहलाए...”

जीवनभर देह, पुत्र, परिवार के लिए न्योछावर हो जाए उसे कहा जाता है
जीव । देशसेवा और जनहित के लिए न्योछावर हो जाए उसे कहा जाता है शहीद और श्रीजीमहाराज तथा सत्पुरुष के लिए तन, मन, धन न्योछावर करे उसे कहा जाता है सच्चा शिष्य । ऐसे सच्चे शिष्य ही मोक्षपद को प्राप्त कर सकते हैं । 

गढ़डा मध्य के ६२वें वचनामृत में रघुवीरजी महाराज ने प्रश्न पूछा है कि, “हे महाराज ! इस जीव का मोक्ष वह क्या करने से होता है ?” तब श्रीजीमहाराज ने उत्तर दिया है कि, “जिसे अपने कल्याण की इच्छा हो उसे अपना जो देह, धन, धाम, कुटुंब, परिवार उन सभी को भगवान की सेवा में जोड़ देना चाहिए और भगवान की सेवा में जो पदार्थ काम न आए तो उसका त्याग कर देना चाहिए । ऐसी रीति से जो भगवान परायण बर्तता है वह गृहस्थाश्रमी हो, तो भी मरते समय भगवान के धाम में नारद-सनकादिक की (मुक्त की) पंक्ति में मिलता है, और परम मोक्ष को पाता है वही उसका उत्तर है ।” 

ऐसे आत्मकल्याण के प्यासे तीन हजार संत और लाखों हरिभक्त भगवान स्वामिनारायण के शरणागत सेवक थे । जिन्होंने एकमात्र भगवान स्वामिनारायण हेतु अपना तन, मन, धन सर्वस्व अर्पण कर रखा था । उनके जीवन का यह मंत्र बन गया था कि, ‘महाराज के लिए ही मेरा जन्म है ।’

एक बार श्रीजीमहाराज ने ऐसा प्रकरण शुरू किया था कि, सत्संगी बंधुओं में जिसे भी दो बेटे हों उनमें से एक-एक को चिट्ठी लिखकर बुलाते और कहते, “हमें एक को साधु करना है ।” 

डांगरवा गांव के अगरोजी और अमरोजी दोनों भाइयों ने यह जाना । उन्होंने तय किया कि, “कभी भी हमारे ऊपर भी यह चिट्ठी आए । इसलिए हमें उस तरह से तैयार रहना चाहिए । सद्. गुणातीतानंद स्वामी ने कहा है कि, ‘अधिक द्रव्य, अच्छा घर और रूपवान स्त्री ये तीन जिसके पास हों वह कभी भगवान में जुड़ नहीं सकता ।’ इसलिए यह घर बेच देते हैं । कहीं महाराज हमें बुलाएं और कहीं इस घर का बंधन हो जाए तो ??” ऐसा सोचकर दोनों भाई घर बेचकर झोपड़ी जैसा घर बनाकर उसमें रहने लगे । जो पैसे आए वे गढ़पुर महाराज के पास भेज दिए । रोज राह देखते कि कब महाराज की चिट्ठी आए और महाराज की सेवा में जाएं । 

एक बार दोनों भाई घर पर थे । मातृश्री बाहर गएं थे । उसी वक्त महाराज की चिट्ठी आई, ‘दो में से एक भाई सेवा में आ जाओ ।’ लेकिन दोनों भाई जाने के लिए तैयार हो गए । अगरोजी ने कहा, “तू मां की सेवा करने रुक जा, मैं सेवा में गढ़पुर जाता हूं ।” अमरोजी ने कहा, “नहीं, मैं जाता हूं । तू मां की सेवा के लिए घर पर
रह ।” दोनों बेटों को इस तरह झगड़ते देख घर आए मातृश्री ने कहा, “बेटा, किसलिए झगड़ रहे हो ?” तब दोनों एक साथ बोल उठे, “मां... मां... गढ़पुर से महाराज की चिट्ठी आई है । चिट्ठी में लिखा है कि दो में से एक भाई आ जाओ, साधु करना है । इसलिए मां मैं जाऊं न ? यह यहां आपकी सेवा में रुकेगा ।” दोनों की महाराज के लिए जीने की तमन्ना देख उनके मातृश्री ने कहा, “बेटों, क्या तुम ऐसा मानते हो कि मैं तुम्हारे सहारे जीती हूं ? तुम्हारी सेवा की मुझे जरूरत पड़ेगी ? महाराज वैसी जरूरत नहीं ही पड़ने देंगे । मैं तो महाराज के सहारे जीती हूं । इसलिए मेरी चिंता बिल्कुल मत करना । जाओ, दोनों जाओ । और मेरी कोख से जन्मे हो तो साधु होकर अनंत का कल्याण करना । हमारा यह जन्म तो महाराज के लिए ही है ।” ऐसा कहकर कलेजे के टुकड़े समान दोनों बेटों को हंसते मुख से, धन्यता अनुभव करते हुए महाराज के पास गढ़पुर साधु होने के लिए भेज दिया ।

एक बार श्रीजीमहाराज पंचाला जा रहे थे । रास्ते में बालागाम आया । बालागाम के प्रेमीभक्त सुंदरमा के घर महाराज अचानक पधारे । महाराज को देखकर सुंदरमा देह का भान भूल गएं । सुंदरमा ने महाराज को खाट बिछाकर, रजाई बिछाकर उस पर विराजमान होने की प्रार्थना की और आनंद के अतिरेक में बोल उठे, “महाराज, मुझसे कुछ मांगिए; मैं आप पर बहुत राज़ी हुई हूं । आप जो मांगें वह मैं आपको दे दूं ।” श्रीजीमहाराज ने कहा, “सुंदरमा, आपकी जो सबसे प्यारी वस्तु हो वह हमें दीजिए ।” सुंदरमा घर में गएं और बहुत विचार किया : ‘इस संदूक में मैंने अपने पूरे जीवन की पूंजी सहेजकर रखी है; वह मुझे बहुत प्यारी
है । वही दे दूं ।’ जब पैसे लेने जाते हैं तब गाय रंभाई और सुंदरमा बोले, “हंअअअ... इस पूंजी से तो मुझे यह गाय बहुत प्यारी है । लाओ न वही दे दूं ।” जब सुंदरमा गाय छोड़ने जाते हैं तभी उनके दो बेटे प्रेमजी और देवजी खेत में गए थे वे दौड़ते हुए घर आए, “मां ओ मां... हमारे घर महाराज पधारे हैं ?!” इतना सुनते ही सुंदरमा को हुआ, ‘सबसे प्यारे तो मुझे मेरे ये दो बेटे हैं । इन्हें ही अर्पण कर दूं ।’ बेटे घर में आए कि तुरंत ही सुंदरमा दोनों बेटों को एक तरफ ले गएं और बात की, “बेटा प्रेमजी, बेटा देवजी, महाराज ने मेरी सबसे प्यारी वस्तु मांगी है । मेरे सबसे प्यारे तो तुम दोनों ही हो । मुझे तुम दोनों को महाराज को अर्पण करना है । उसमें तुम्हें कोई आपत्ति तो नहीं है न !” तभी दोनों बेटे एक साथ बोल उठे, “अरे यह क्या बोल रहे हो मां ? इसमें पूछना ही न हो । महाराज के लिए तो हमारा जीवन है । ऐसे ही पाठ आपने हमें बचपन से सिखाए हैं ।” बेटों के वचन सुनकर सुंदरमा बहुत राज़ी हो गएं । और दोनों बेटों का हाथ पकड़कर महाराज के पास ले गएं । दोनों के हाथ महाराज के हाथों में सौंपते हुए कहा, “महाराज लीजिए, ये दोनों मेरे सबसे प्यारे हैं । आज से आपको अर्पण । दोनों का स्वीकार करें महाराज ।” इन दोनों में आपके जैसे दिव्य कल्याणकारी गुण आएं और सहजानंदी सिंह बनें ऐसे दिव्य आशीर्वाद दीजिए महाराज ।” इतना कहकर सुंदरमा देहभान भूलकर नाचने और कूदने लगें । श्रीजीमहाराज ने दोनों बेटों को दीक्षा दी । देवजी को नाम दिया ‘दहरानंद स्वामी ।’ और प्रेमजी को नाम दिया, ‘प्रसादानंद स्वामी ।’

इस प्रकार, सुंदरमा की तरह हम भी अपने बेटा-बेटियों को बचपन से ही महाराज के लिए जीवन जीने की दिव्य प्रेरणा देकर सुंदरमा की तरह महाराज के अंतर का राज़ीपा कमा लें । 

धन्य है ऐसी माता को !! जिसने बचपन से ही कलेजे के टुकड़ों को महाराज के लिए जीने के पीयूष (अमृत) पिलाए है !!

आइए, “महाराज के लिए ही मेरा जन्म है” इस जीवनमंत्र को स्व-जीवन में लक्ष्यार्थ करने हेतु स्वाध्याय करें :

 

स्व-अध्ययन 

  1. महाराज ने दिया हुआ तन, मन और धन महाराज के उपयोग में अर्पण होता है ?
  2. महाराज के लिए ही मेरा जन्म है । स्वजीवन में इस समझ को दृढ़ कर, अपने बेटे-बेटियों को बचपन से दृढ़ करवाते हैं ?
  3. हमारा समय, शक्ति, बुद्धि, कौशल का महाराज के लिए विशेष रूप से उपयोग हो ऐसे प्रयास होते हैं ?
  4. एक निश्चित आयु के बाद घर-संसार से निवृत्त होकर अधिक समय मंदिर और संतों की सेवा में उपयोग हो ऐसा आयोजन करने के उपाय में रहा जाता हैं ? 

५. महाराज की आज्ञा के अनुसार नियमित रूप से समय का धर्मादा

   निकलता है ? 

 

दृढ़ संकल्प करें कि

रोज़ नियमित मैं कौन हूं ? किसलिए आया हूं ? मुझे क्या करना है ? और मैं क्या कर रहा हूं ? ऐसे चार प्रश्नों का मनन सहित चिंतन करें ही ।