SMVS
\

कलम

स्वामिनारायण भगवान मेरे इष्टदेव हैं

जीवनमंत्र की इस सर्वप्रथम कलम द्वारा प्यारे गुरुजी हमें मिले हुए महाराज की खुमारी, कैफ़ तथा उनके विषय में अचल आश्रय यानी पतिव्रता की भक्ति की दृढ़ता कराना चाहते हैं । सर्वोपरी निष्ठा और पतिव्रता की भक्ति यह कारण सत्संग की मूलभूत नींव है । जिसे दृढ़ करना कारण सत्संग के प्रत्येक सदस्य के लिए अनिवार्य है ।

इस कलम का उच्चारण करते ही रोमावली खड़ी हो जाए, छाती फूल जाए... यह मिले हुए महाराज की अस्मिता का प्रतीक है । ‘मेरे इष्टदेव हैं’ यह शब्द ही पावर दे देता है । मेरे यानी मेरे अपने, पर्सनल । इष्टदेव यानी मुख्य देव, मेरे सबसे प्रिय देव, मेरे प्राणाधार हैं । कौन ? अनंतकोटि ब्रह्मांड के अधिपति, सर्वोपरी, सर्वावतारी स्वामिनारायण भगवान ।

“कैसे मिले हैं आप हरि, कैसी अगाध दया की;

कोटानकोटि को एक ही मिली, किरण व्याप्त रही है धरी;

जबकि मुझे अनादि करके, मुखोन्मुख मिले हो हरि ।”

कोई दातून वाली को चक्रवर्ती राजा रानी बना दे तो रानी को अपनी और अपने पति की पहचान देते हुए कितना गौरव होता है कि चक्रवर्ती राजाधिराज मेरे पतिदेव हैं । बस, ऐसा ही कुछ हमारे केस में हो गया है । अनंतकोटि ब्रह्मांड के अधिपति, राजाधिराज स्वामिनारायण भगवान हमारे इष्टदेव हैं । आनंद का महासागर उमड़ आए ऐसी यह बात है । अब इस कलम को हमें अपने जीवन में चरितार्थ करना है ।

पतिव्रता की भक्ति इष्टदेव भगवान स्वामिनारायण के विषय में न बर्ते और अन्य अवतारादिक का भार, प्रतीति, महिमा, प्रीति रह जाए तो क्या परिणाम भुगतना पड़े वह स्वयं श्रीहरि के ही वचनों द्वारा जाने;

“सत्संग में रहकर जो परोक्ष की आराधना-उपासना करे तो वह अक्षरधाम में नहीं जा सकता ।” अर्थात् दूसरे किसी धाम में अटक जाता है ।

  • श्रीहरिचरित्रामृतसागर  : पूर-४, तरंग-१९

श्रीजीमहाराज के ये वचन पढ़कर जरा रुकें... विचारें... महाराज के सिवा किसी अन्य ऐश्वर्यार्थी का, दवा-औषधि, जंत्र-मंत्र, डोरा-धागा, शगुन-अपशगुन का भार, प्रतीति या प्रीति रह तो नहीं जाती न ? दैहिक, आर्थिक दु:खों में अपने इष्टदेव को छोड़कर ऐसे किसी माध्यमों का आश्रय तो नहीं ले लिया जाता न ?

श्रीजीमहाराज का जो सच्चा शरणागत होता है उसे जंत्र-मंत्र, डोरा-धागा आदि किसी का भार नहीं रहता । एकमात्र श्रीजीमहाराज के प्रति अटूट श्रद्धा और अचल भरोसा होता है ।

पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाए वैसे ही सद्. गुणातीतानंद स्वामी के दिव्य योग में आने से डकैती पर चढ़े खूंखार लुटेरे वालेरा वरु का जीवन परिवर्तन हो गया । स्वामी के समागम से सत्संगी बने और श्रीजीमहाराज की दृढ़ निष्ठा हो गई ।

एक बार वालेरा वरु लंबी बीमारी में फंस गए । वैद्यों-हकीमों की बहुत दवा की परंतु तबीयत सुधरने के बजाय और बिगड़ती गई । इससे उनकी बहन की श्रद्धा कम हो गई । मंत्रित डोरा बांधने की वालेरा से सिफारिश की । वालेरा ने कहा, “मेरे महाराज की जैसी मर्जी होगी वैसा होगा । इस देह के सुख के लिए अपने इष्टदेव की उपासना का भंग नहीं करूंगा ।” इसलिए वालेरा को पता न चले उस तरह उनकी बहन ने मंत्रित डोरा खाट के पाए से बांध दिया ।

उसी रात सद्. गुणातीतानंद स्वामी ने हाथ में घास लेकर वालेरा को स्वप्न में दर्शन दिए, “वालेरा, सिंह होकर घास खाई न !” ऐसा तीन बार स्वामी ने कहा फिर भी वालेरा को कुछ समझ नहीं आया । परंतु दूसरे दिन पता चला कि बहन ने खाट के पाए से मंत्रित डोरा बांधा है । इससे अपने इष्टदेव के प्रति पतिव्रता की भक्ति में भंग कराने वाली बहन पर आगबबूला हो गए और जीवनभर बहन का मुख नहीं देखा ।

वर्तमान समय में प्यारे गुरुदेव प.पू. बापजी और प्यारे गुरुजी के योग-समागम से कैसे निष्ठावान सहजानंदी सिंह समान हरिभक्त समाज की कतार खड़ी हुई है !

अहमदाबाद, घोडासर क्षेत्र में रहने वाले किशोरमुक्त दीपभाई परषोत्तमभाई पटेल के जीवन का यह प्रसंग है । मई, २०२५ में ये मुक्तराज पीलिया के रोग से घिर गए । डॉक्टरी जांच के बाद पता चला कि पीलिया चौबीस पॉइंट है । उन्हें अस्पताल में भर्ती किया । थोड़ी राहत होने पर छुट्टी मिली । परंतु गांव (लुणावाड़ा) में रहने वाले संबंधी मंत्रित डोरा करवाकर इस मुक्तराज को बांधने के लिए ले
आए । डोरा देखकर मुक्तराज व्याकुल हो गए । उन्होंने कहा कि, “यह डोरा मैं आज भी नहीं बांधूंगा और कल भी नहीं ही बांधूंगा । मुझे मेरे महाराज पर भरोसा है । वे जो करते हैं वह अच्छा ही करते होंगे ।”

इतने से बात नहीं रुकी । कुछ दिनों बाद बॉम्बे से उनके चाचा लुणावाड़ा आए थे । उन्होंने मुक्तराज को फोन करके कहा, “डोरा नहीं बंधवाना हो तो कोई बात नहीं परंतु गांव आ जाओ तो पीलिया उतरवा देते हैं ।” मुक्तराज जानते थे कि पीलिया उतरवाने की विधि कराने के लिए परोक्ष स्थान पर ले जाएंगे । इसलिए उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया ।

कैसी श्रीजीमहाराज के प्रति अनन्य निष्ठा !! दैहिक बीमारी में हम ऐसी श्रद्धा, भरोसा, निष्ठा महाराज के प्रति रख सकते हैं या जहां-तहां सिर पटकने की इच्छा हो आती है  ??

श्रीहरिचरित्रामृतसागर ग्रंथ में पूर-१०, तरंग-५४ में श्रीहरि ने कहा है कि, “दीर्घ रोग हो और रात-दिन पीड़ा से रोए तो भी अनजानी औषधि खाए नहीं, मलिन मंत्र जपाए नहीं, डोरा बंधवाए नहीं, मलिन शक्ति की प्रतीति रखे नहीं । सत्संग रखने में हानि हो तो भी पीछे हटे नहीं, परंतु चढ़ता रंग रहे और अग्नि में सुवर्ण की तरह जैसे तपे वैसे प्रदीप्त हो यह निश्चय वाले के लक्षण हैं ।”

जैसे केसरी सिंह को सौ उपवास (लांघण) पड़े तो भी कभी घास नहीं खाता वैसे इष्टदेव सर्वोपरी भगवान स्वामिनारायण का आश्रित कदाचित् कैसे भी दुःख, कठिनाई, पीड़ा, आपत्ति से घिरा हो तो भी भगवान स्वामिनारायण के सिवाय अन्य किसी का आश्रय न ले । ‘मेरे तो एक तुम ही अधारा’ का जबरदस्त कैफ़ हो ।

डभाण में विष्णुदास पटेल और उनके धर्मपत्नी भगवान स्वामिनारायण के निष्ठावान भक्त थे । घर की स्थिति दुर्बल । दो बेटियां थीं उनका ब्याह कर दिया
था । एक भी बेटा नहीं । तथापि, शरीर अनेक रोगों का घर बन गया था । फिर भी श्रद्धापूर्वक रोज पैदल चलते मंदिर में ठाकुरजी के दर्शन कर मजदूरी के काम पर जाते थे ।

एक दिन रास्ते पर उनके आगे एक परोक्ष के महात्माजी चले जा रहे थे । रास्ते में दो सांड क्रोधावेश में आकर आमने-सामने झगड़ रहे थे । रास्ते पर उनका पागलपन देख विष्णुदास और उनके पत्नी एक चबूतरे पर चढ़ गए । परंतु महात्माजी सांड की चपेट में आ गए । सांड ने सींगों से महात्माजी को दूर फेंक दिया । शरीर में भीतरी मार लगने से वे बेहोश हो गए । इन्सानियत के नाते विष्णुदास और उनके पत्नी महात्माजी को झोली में डालकर घर ले गए । हल्दी-नमक पीसकर उसका लेप पूरे शरीर पर लगाया । थोड़े दिन रोज इस तरह सेवा कर महात्माजी को ठीक किया ।

महात्माजी ने उनके घर की स्थिति देखकर निकलते समय झोली में से तीन गोलियां निकालीं और विष्णुदास पटेल से कहा, “मैं आपकी नि:स्वार्थ सेवाभावना से राज़ी हुआ हूं । हिमालय की तलहटी से तीन जड़ी-बूटियां लाया हूं । प्रथम केसरी रंग की इस गोली को घिसकर पी जाना । आपके यहां एक पुत्र होगा । दूसरी पीले रंग की गोली घिसकर पी जाओगे तो शरीर के तमाम रोग मिट जाएंगे । तीसरी लाल रंग की गोली घिसकर पी जाओगे तो आपकी दरिद्रता दूर हो जाएगी ।”

महात्माजी की बात सुनकर विष्णुदास पटेल बोले, “महात्माजी, इन गोलियों से यदि हमारे दुःख दूर होने वाले हों तो इन्हें वापस झोली में रख दीजिए । हमें जो दुःख है वह तो हमारे इष्टदेव भगवान स्वामिनारायण की इच्छा-मर्जी से है । हमारी किसी आज्ञा लोप की शिक्षा होगी । यह तो इष्टदेव की दी हुई प्रसादी है । स्वामिनारायण भगवान हमारे इष्टदेव हैं । वे राज़ी होकर हमारे दुःख काटेंगे उस दिन हमें मंजूर है । परंतु लौकिक सुख के लिए इस जड़ी-बूटी का आधार हमें नहीं लेना है ।”

इस सत्संगी दंपत्ति ने एकमात्र इष्टदेव भगवान स्वामिनारायण का ही आधार पकड़ रखा । सुखी होने की चाबी नजर के सामने होने के बावजूद अनाश्रय का संकल्प तक नहीं हुआ । लौकिक सुख प्राप्ति के लिए अनाश्रय कर इष्टदेव की उपासना में भंग न किया जाए इस बात की कितनी दृढतापूर्वक स्पष्टता होगी । इतना ही नहीं, इन महात्माजी को समागम कराकर भगवान स्वामिनारायण की निष्ठा दृढ करा दी । थोड़े दिन बाद श्रीजीमहाराज डभाण पधारे तब महात्माजी ने महाराज के दर्शन कर साधु होने की प्रार्थना की । महाराज ने उन्हें दीक्षा देकर साधु बनाया । उनका नाम रखा ‘वैराग्यानंद स्वामी’ ।

प्यारे मुक्तों, यदि हमने प्यारे गुरुदेव और प्यारे गुरुजी जैसे दिव्य सत्पुरुष की सेवा की हो तो स्वजीवन में हम भी सर्वोपरी उपासना की ऐसी खुमारी
रखें ।


 

स्व-अध्ययन

  1. स्वामिनारायण भगवान मेरे इष्टदेव हैं ऐसा गौरव से सबके आगे बोल सकते हैं ? 
  2. स्वामिनारायण भगवान के अलावा अन्य किसी का भार-प्रतीति-प्रीती रह जाती है ? 
  3. गुणगान, महिमागान, भक्ति, उपासना, सेवा, पूजा आदि पतिव्रता स्त्री की तरह एक भगवान स्वामिनारायण का ही होता है ? 
  4. किसी विपरीत स्थिति-परिस्थिति में किसी भी प्रकार की अंधश्रद्धा का आधार ले लिया जाता है ? 
  5. लौकिक सुख की प्राप्ति के लिए कभी अनाश्रय हो जाता है ? 

 

दृढ संकल्प करें कि,

जो सुख-दुःख आए उसे इष्टदेव स्वामिनारायण भगवान की मर्जी समझकर राज़ी रहना है । श्रद्धा कम हो तो श्रीजीमहाराज से प्रार्थना करनी परंतु अनाश्रय तो नहीं ही करना है ।

कलम

स्वामिनारायण भगवान मेरे इष्टदेव हैं

जीवनमंत्र की इस सर्वप्रथम कलम द्वारा प्यारे गुरुजी हमें मिले हुए महाराज की खुमारी, कैफ़ तथा उनके विषय में अचल आश्रय यानी पतिव्रता की भक्ति की दृढ़ता कराना चाहते हैं । सर्वोपरी निष्ठा और पतिव्रता की भक्ति यह कारण सत्संग की मूलभूत नींव है । जिसे दृढ़ करना कारण सत्संग के प्रत्येक सदस्य के लिए अनिवार्य है ।

इस कलम का उच्चारण करते ही रोमावली खड़ी हो जाए, छाती फूल जाए... यह मिले हुए महाराज की अस्मिता का प्रतीक है । ‘मेरे इष्टदेव हैं’ यह शब्द ही पावर दे देता है । मेरे यानी मेरे अपने, पर्सनल । इष्टदेव यानी मुख्य देव, मेरे सबसे प्रिय देव, मेरे प्राणाधार हैं । कौन ? अनंतकोटि ब्रह्मांड के अधिपति, सर्वोपरी, सर्वावतारी स्वामिनारायण भगवान ।

“कैसे मिले हैं आप हरि, कैसी अगाध दया की;

कोटानकोटि को एक ही मिली, किरण व्याप्त रही है धरी;

जबकि मुझे अनादि करके, मुखोन्मुख मिले हो हरि ।”

कोई दातून वाली को चक्रवर्ती राजा रानी बना दे तो रानी को अपनी और अपने पति की पहचान देते हुए कितना गौरव होता है कि चक्रवर्ती राजाधिराज मेरे पतिदेव हैं । बस, ऐसा ही कुछ हमारे केस में हो गया है । अनंतकोटि ब्रह्मांड के अधिपति, राजाधिराज स्वामिनारायण भगवान हमारे इष्टदेव हैं । आनंद का महासागर उमड़ आए ऐसी यह बात है । अब इस कलम को हमें अपने जीवन में चरितार्थ करना है ।

पतिव्रता की भक्ति इष्टदेव भगवान स्वामिनारायण के विषय में न बर्ते और अन्य अवतारादिक का भार, प्रतीति, महिमा, प्रीति रह जाए तो क्या परिणाम भुगतना पड़े वह स्वयं श्रीहरि के ही वचनों द्वारा जाने;

“सत्संग में रहकर जो परोक्ष की आराधना-उपासना करे तो वह अक्षरधाम में नहीं जा सकता ।” अर्थात् दूसरे किसी धाम में अटक जाता है ।

  • श्रीहरिचरित्रामृतसागर  : पूर-४, तरंग-१९

श्रीजीमहाराज के ये वचन पढ़कर जरा रुकें... विचारें... महाराज के सिवा किसी अन्य ऐश्वर्यार्थी का, दवा-औषधि, जंत्र-मंत्र, डोरा-धागा, शगुन-अपशगुन का भार, प्रतीति या प्रीति रह तो नहीं जाती न ? दैहिक, आर्थिक दु:खों में अपने इष्टदेव को छोड़कर ऐसे किसी माध्यमों का आश्रय तो नहीं ले लिया जाता न ?

श्रीजीमहाराज का जो सच्चा शरणागत होता है उसे जंत्र-मंत्र, डोरा-धागा आदि किसी का भार नहीं रहता । एकमात्र श्रीजीमहाराज के प्रति अटूट श्रद्धा और अचल भरोसा होता है ।

पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाए वैसे ही सद्. गुणातीतानंद स्वामी के दिव्य योग में आने से डकैती पर चढ़े खूंखार लुटेरे वालेरा वरु का जीवन परिवर्तन हो गया । स्वामी के समागम से सत्संगी बने और श्रीजीमहाराज की दृढ़ निष्ठा हो गई ।

एक बार वालेरा वरु लंबी बीमारी में फंस गए । वैद्यों-हकीमों की बहुत दवा की परंतु तबीयत सुधरने के बजाय और बिगड़ती गई । इससे उनकी बहन की श्रद्धा कम हो गई । मंत्रित डोरा बांधने की वालेरा से सिफारिश की । वालेरा ने कहा, “मेरे महाराज की जैसी मर्जी होगी वैसा होगा । इस देह के सुख के लिए अपने इष्टदेव की उपासना का भंग नहीं करूंगा ।” इसलिए वालेरा को पता न चले उस तरह उनकी बहन ने मंत्रित डोरा खाट के पाए से बांध दिया ।

उसी रात सद्. गुणातीतानंद स्वामी ने हाथ में घास लेकर वालेरा को स्वप्न में दर्शन दिए, “वालेरा, सिंह होकर घास खाई न !” ऐसा तीन बार स्वामी ने कहा फिर भी वालेरा को कुछ समझ नहीं आया । परंतु दूसरे दिन पता चला कि बहन ने खाट के पाए से मंत्रित डोरा बांधा है । इससे अपने इष्टदेव के प्रति पतिव्रता की भक्ति में भंग कराने वाली बहन पर आगबबूला हो गए और जीवनभर बहन का मुख नहीं देखा ।

वर्तमान समय में प्यारे गुरुदेव प.पू. बापजी और प्यारे गुरुजी के योग-समागम से कैसे निष्ठावान सहजानंदी सिंह समान हरिभक्त समाज की कतार खड़ी हुई है !

अहमदाबाद, घोडासर क्षेत्र में रहने वाले किशोरमुक्त दीपभाई परषोत्तमभाई पटेल के जीवन का यह प्रसंग है । मई, २०२५ में ये मुक्तराज पीलिया के रोग से घिर गए । डॉक्टरी जांच के बाद पता चला कि पीलिया चौबीस पॉइंट है । उन्हें अस्पताल में भर्ती किया । थोड़ी राहत होने पर छुट्टी मिली । परंतु गांव (लुणावाड़ा) में रहने वाले संबंधी मंत्रित डोरा करवाकर इस मुक्तराज को बांधने के लिए ले
आए । डोरा देखकर मुक्तराज व्याकुल हो गए । उन्होंने कहा कि, “यह डोरा मैं आज भी नहीं बांधूंगा और कल भी नहीं ही बांधूंगा । मुझे मेरे महाराज पर भरोसा है । वे जो करते हैं वह अच्छा ही करते होंगे ।”

इतने से बात नहीं रुकी । कुछ दिनों बाद बॉम्बे से उनके चाचा लुणावाड़ा आए थे । उन्होंने मुक्तराज को फोन करके कहा, “डोरा नहीं बंधवाना हो तो कोई बात नहीं परंतु गांव आ जाओ तो पीलिया उतरवा देते हैं ।” मुक्तराज जानते थे कि पीलिया उतरवाने की विधि कराने के लिए परोक्ष स्थान पर ले जाएंगे । इसलिए उन्होंने स्पष्ट मना कर दिया ।

कैसी श्रीजीमहाराज के प्रति अनन्य निष्ठा !! दैहिक बीमारी में हम ऐसी श्रद्धा, भरोसा, निष्ठा महाराज के प्रति रख सकते हैं या जहां-तहां सिर पटकने की इच्छा हो आती है  ??

श्रीहरिचरित्रामृतसागर ग्रंथ में पूर-१०, तरंग-५४ में श्रीहरि ने कहा है कि, “दीर्घ रोग हो और रात-दिन पीड़ा से रोए तो भी अनजानी औषधि खाए नहीं, मलिन मंत्र जपाए नहीं, डोरा बंधवाए नहीं, मलिन शक्ति की प्रतीति रखे नहीं । सत्संग रखने में हानि हो तो भी पीछे हटे नहीं, परंतु चढ़ता रंग रहे और अग्नि में सुवर्ण की तरह जैसे तपे वैसे प्रदीप्त हो यह निश्चय वाले के लक्षण हैं ।”

जैसे केसरी सिंह को सौ उपवास (लांघण) पड़े तो भी कभी घास नहीं खाता वैसे इष्टदेव सर्वोपरी भगवान स्वामिनारायण का आश्रित कदाचित् कैसे भी दुःख, कठिनाई, पीड़ा, आपत्ति से घिरा हो तो भी भगवान स्वामिनारायण के सिवाय अन्य किसी का आश्रय न ले । ‘मेरे तो एक तुम ही अधारा’ का जबरदस्त कैफ़ हो ।

डभाण में विष्णुदास पटेल और उनके धर्मपत्नी भगवान स्वामिनारायण के निष्ठावान भक्त थे । घर की स्थिति दुर्बल । दो बेटियां थीं उनका ब्याह कर दिया
था । एक भी बेटा नहीं । तथापि, शरीर अनेक रोगों का घर बन गया था । फिर भी श्रद्धापूर्वक रोज पैदल चलते मंदिर में ठाकुरजी के दर्शन कर मजदूरी के काम पर जाते थे ।

एक दिन रास्ते पर उनके आगे एक परोक्ष के महात्माजी चले जा रहे थे । रास्ते में दो सांड क्रोधावेश में आकर आमने-सामने झगड़ रहे थे । रास्ते पर उनका पागलपन देख विष्णुदास और उनके पत्नी एक चबूतरे पर चढ़ गए । परंतु महात्माजी सांड की चपेट में आ गए । सांड ने सींगों से महात्माजी को दूर फेंक दिया । शरीर में भीतरी मार लगने से वे बेहोश हो गए । इन्सानियत के नाते विष्णुदास और उनके पत्नी महात्माजी को झोली में डालकर घर ले गए । हल्दी-नमक पीसकर उसका लेप पूरे शरीर पर लगाया । थोड़े दिन रोज इस तरह सेवा कर महात्माजी को ठीक किया ।

महात्माजी ने उनके घर की स्थिति देखकर निकलते समय झोली में से तीन गोलियां निकालीं और विष्णुदास पटेल से कहा, “मैं आपकी नि:स्वार्थ सेवाभावना से राज़ी हुआ हूं । हिमालय की तलहटी से तीन जड़ी-बूटियां लाया हूं । प्रथम केसरी रंग की इस गोली को घिसकर पी जाना । आपके यहां एक पुत्र होगा । दूसरी पीले रंग की गोली घिसकर पी जाओगे तो शरीर के तमाम रोग मिट जाएंगे । तीसरी लाल रंग की गोली घिसकर पी जाओगे तो आपकी दरिद्रता दूर हो जाएगी ।”

महात्माजी की बात सुनकर विष्णुदास पटेल बोले, “महात्माजी, इन गोलियों से यदि हमारे दुःख दूर होने वाले हों तो इन्हें वापस झोली में रख दीजिए । हमें जो दुःख है वह तो हमारे इष्टदेव भगवान स्वामिनारायण की इच्छा-मर्जी से है । हमारी किसी आज्ञा लोप की शिक्षा होगी । यह तो इष्टदेव की दी हुई प्रसादी है । स्वामिनारायण भगवान हमारे इष्टदेव हैं । वे राज़ी होकर हमारे दुःख काटेंगे उस दिन हमें मंजूर है । परंतु लौकिक सुख के लिए इस जड़ी-बूटी का आधार हमें नहीं लेना है ।”

इस सत्संगी दंपत्ति ने एकमात्र इष्टदेव भगवान स्वामिनारायण का ही आधार पकड़ रखा । सुखी होने की चाबी नजर के सामने होने के बावजूद अनाश्रय का संकल्प तक नहीं हुआ । लौकिक सुख प्राप्ति के लिए अनाश्रय कर इष्टदेव की उपासना में भंग न किया जाए इस बात की कितनी दृढतापूर्वक स्पष्टता होगी । इतना ही नहीं, इन महात्माजी को समागम कराकर भगवान स्वामिनारायण की निष्ठा दृढ करा दी । थोड़े दिन बाद श्रीजीमहाराज डभाण पधारे तब महात्माजी ने महाराज के दर्शन कर साधु होने की प्रार्थना की । महाराज ने उन्हें दीक्षा देकर साधु बनाया । उनका नाम रखा ‘वैराग्यानंद स्वामी’ ।

प्यारे मुक्तों, यदि हमने प्यारे गुरुदेव और प्यारे गुरुजी जैसे दिव्य सत्पुरुष की सेवा की हो तो स्वजीवन में हम भी सर्वोपरी उपासना की ऐसी खुमारी
रखें ।


 

स्व-अध्ययन

  1. स्वामिनारायण भगवान मेरे इष्टदेव हैं ऐसा गौरव से सबके आगे बोल सकते हैं ? 
  2. स्वामिनारायण भगवान के अलावा अन्य किसी का भार-प्रतीति-प्रीती रह जाती है ? 
  3. गुणगान, महिमागान, भक्ति, उपासना, सेवा, पूजा आदि पतिव्रता स्त्री की तरह एक भगवान स्वामिनारायण का ही होता है ? 
  4. किसी विपरीत स्थिति-परिस्थिति में किसी भी प्रकार की अंधश्रद्धा का आधार ले लिया जाता है ? 
  5. लौकिक सुख की प्राप्ति के लिए कभी अनाश्रय हो जाता है ? 

 

दृढ संकल्प करें कि,

जो सुख-दुःख आए उसे इष्टदेव स्वामिनारायण भगवान की मर्जी समझकर राज़ी रहना है । श्रद्धा कम हो तो श्रीजीमहाराज से प्रार्थना करनी परंतु अनाश्रय तो नहीं ही करना है ।