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कलम

सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं

जीवनमंत्र की इस कलम में कारण सत्संग की उत्कृष्ट समझ दी गई है । यही समझ को प्यारे गुरुजी ने ‘अनादिमुक्त हरि मूर्ति में ही हूं मैं’ प्रार्थना में पिरो ली है । यही कारण सत्संग का मूल ज्ञान है, मूल लटक है । इस लटक के अभ्यास से ही अनादिमुक्त की स्थिति की ओर गति होती है ।

इस कलम के परभावी शब्दों को विस्तार से समझते हैं । सर्वप्रथम ‘सदेह’ यानी क्या ? क्या पंचभूत के देह सहित धाम में जा सकते है ? नहीं । मायिक देह से अमायिक, अक्षरातीत पुरुषोत्तम की मूर्ति में कैसे जा सकते है ? परंतु सामान्यतः ऐसी समझ होती है कि मरने के बाद ही धाम में जा सकते है । परंतु कारण सत्संग में सदेह कल्याण के वचन (कॉल) मिलते हैं । संक्षेप में, कारण सत्संग में कल्याण का वायदा नहीं है; नकद कल्याण है । मरने के बाद कल्याण होगा उसे वायदा कहा जाता है और सदेह कल्याण हो गया है उसे नकद कहा जाता है ।

अब धाम का विवरण समझते हैं । पूरे स्वामिनारायण संप्रदाय में अक्षरधाम में जाना है ऐसी समझ प्रचलित है । परंतु बापाश्री द्वारा दिया गया ज्ञान इससे आगे
है । श्रीजीमहाराज ने पंचाला के पहले वचनामृत में कहा है कि, “अक्षरब्रह्म है वह तो भगवान के (हमारे) अंग का प्रकाश है अथवा उनके (हमारे) रहने का धाम
है ।” अर्थात् अक्षरधाम वह श्रीजीमहाराज की मूर्ति से निकलने वाले तेज का समूह है । वह महाराज के रहने का धाम है; मुक्तों का नहीं । मुक्त तो मूर्ति में रहते हैं । इसलिए अक्षरधाम में जाना है वह समझ पूरी नहीं है । अक्षरधाम कार्य है और महाराज की मूर्ति कारण है । हमें महाराज और सत्पुरुष ने कृपा करके अनादिमुक्त करके मूर्ति में रखा है । इसलिए हमारा धाम मूर्ति है । सद्. ब्रह्मानंद स्वामी ने इस लटक को कीर्तन में वर्णित किया है,

“रसबस होय रही रसिया संग, ज्यों मिसरी पय मांही मिली ।”

मूल मुद्दा यहां पूर्णकामपन का है अर्थात् कृतार्थपन का है । इसका अर्थ
क्या ? तो मेरा कल्याण हो ही गया है इसकी अडिग (निरुत्थानपन से) दृढ़ता । इसके लिए पहले कल्याण विषयक कुछ बातें समझना अत्यंत आवश्यक है ।

गढ़ड़ा मध्य के ८वें वचनामृत में महाराज ने कल्याण की अवधारणा बताई है कि, “प्रत्यक्ष भगवान की प्राप्ति ही परमपद है ।” यानी महाराज की मूर्ति ही कल्याण का स्वरूप है । भगवान की प्राप्ति होना ही कल्याण है । अब कल्याण किसका होता है ? तो कीर्तन में कहा गया है कि,

“या तो प्रगट मिले भगवान रे, या तो उनके मिले हुए से कल्याण रे;

उसके बिना कोटि उपाय रे, मोक्ष आत्यंतिक नहीं होवे रे ।”

अर्थात् या तो प्रकट भगवान मिलें या तो उनसे मिले हुए अनादिमुक्त सत्पुरुष मिलें तभी आत्यंतिक कल्याण होता है । गढ़ड़ा प्रथम के ५४वें वचनामृत में भी सत्पुरुष को मोक्ष का द्वार कहा गया है । क्योंकि जीव को कल्याण के कोल (वचन) देने का कार्य महाराज अवरभाव में अदृश्य होने के बाद सत्पुरुष के द्वारा करते
है । सत्पुरुष का मुख्य कार्य ही यही है । उनके दर्शन, स्पर्श, सेवा, समागम या आशीर्वाद में जो कोई जीव आता है, उसके अनंत जन्मों के पाप, पुण्य, कर्म जलाकर विधाता के लेख पर मेख मारकर उसे निराकार में से साकार पुरुषोत्तमरूप करते हैं, मूर्तिरूप करके मूर्ति में रखते हैं और उसके देह के स्थान पर सत्पुरुष की कृपा से महाराज प्रतिलोम रूप में आकर विराजमान होते हैं । इसे कहते है कारण सत्संग के वर्तमान, इसे ही कहते है कल्याण के कोल (वचन) । जो केवल और केवल सत्पुरुष द्वारा ही मिलते हैं । उनके अंतर के राज़ीपा से ही इस ज्ञान की दृढ़ता होती है और अनुभव तक पहुंचा जाता है ।

यह कोल (वचन) मिले उसे कहते हैं प्राप्ति । कारण सत्संग में प्राप्ति बिल्कुल मुफ़्त है । पात्रता के बगैर असीमित मिलती है । परंतु उसके बाद मुमुक्षु को सत्पुरुष के सान्निध्य-समागम से श्रीजीमहाराज के स्वरूप का सर्वोपरी ज्ञान समझकर अनन्य निष्ठा और पंचवर्तमान की आज्ञा दृढ़ करनी पड़ती है । और उसके बाद अपने स्वरूप की पहचान करके ‘सदेह मैं मूर्ति में ही हूं’ इस लटक का अभ्यास करना पड़ता है । ऐसे ही ज्ञान-ध्यान के प्रयास से सत्पुरुष राज़ी होते हैं और अनादि की स्थिति कराते हैं ।

“जिसे परिपूर्ण निश्चय हो वह तो ऐसा समझे कि मुझे ये भगवान मिले उस दिन से ही मेरा कल्याण हो चुका है, और जो मेरा दर्शन करेगा या मेरी बात सुनेगा वह जीव भी सभी पापों से मुक्त होकर परमपद को पाएगा ।”   - वच. वर. १२

इस पूरी अध्यात्म यात्रा में कृतार्थपन बहुत महत्त्वपूर्ण है । इस ज्ञान के अभ्यास की मुख्य रीति यही है कि मेरा कल्याण हो गया है, मूर्ति मिल गई है, अनादिमुक्त ही हूं । ऐसे कृतार्थपन में रहकर स्थिति के लिए प्रयास करना । जिसे बापाश्री ने कहा, “अधूरा मानना नहीं और पूरा मानकर बैठे रहना नहीं ।” फिर, वृंदावनबापा ने कहा, “पड़ाव (मुकाम) छोड़ना नहीं और निशाना चूकना नहीं ।”

हम पर बहुत बड़ी कृपा है कि गुरुदेव प.पू. बापजी और गुरुजी प.पू. स्वामीश्री ने हमारे एस.एम.वी.एस. के पूरे समाज को वर्तमान धराकर, देह - देह के भावों को छुड़ाकर मूर्ति में रख लिया है । परिणाम स्वरूप एस.एम.वी.एस. का छोटा बच्चा भी आज छाती ठोककर कह सकता है कि, ‘सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं । ११०% मेरा आत्यंतिक कल्याण हो ही चुका है ।’

पहले भी जिन भक्तों को श्रीजीमहाराज के स्वरूप की सर्वोपरी निष्ठा दृढ़ हुई थी और सदेह में आत्यंतिक कल्याण की स्वीकृति हो गई थी, उन भक्तों का रजमा (उल्लास), मिली हुई प्राप्ति का कैफ़ वास्तव में वंदनीय, पूजनीय और दर्शनीय
था ।

हलवद के अमरशी खत्री में ऐसा ही पूर्णकामपन रहता था । ध्रांगध्रा नरेश ने जब उनसे पूछा कि, “ऐ अमरशी, तू यह पूरा दिन ‘स्वामिनारायण... स्वामिनारायण...’ करता है तो क्या स्वामिनारायण तेरा कल्याण करेंगे ?” तब अमरशी भक्त ने खुमारी भरा जवाब दिया, “बापू, जिस दिन से मुझे स्वामिनारायण भगवान मिले उस दिन से मेरा तो कल्याण हो ही गया है परंतु मेरे घर में रहने वाले मनुष्य, पशु-पक्षी और कुत्ते-बिल्ली का भी कल्याण हो गया है । इतना ही नहीं, हे नरेश, आज आपने मेरी बात सुनी इसलिए आपका भी कल्याण हो गया, तो फिर मेरे कल्याण में क्या संशय रहे ?” अमरशी भक्त की बात सुनकर ध्रांगध्रा नरेश मन ही मन अमरशी भक्त और भगवान स्वामिनारायण को वंदन करने लगे ।

भुज के महामुक्त लाधीबा ने एक दिन अपने भाई हरजीवनभाई को मिली प्राप्ति की महिमा कहते हुए कहा कि भाई,

“हमारे भाग्य का नहीं कोई पार, सहज ही मिले हैं धर्मकुमार ।

देखो परोक्ष भक्त की रीति, स्वर्ग जाने खर्च करे लाखों वित्त ।

देह-दमन करते हैं मथकर, पर निश्चय कल्याण का नहीं ।

गांव-गिरास बहुत देते, दान देने में कोई कमी नहीं रखते ।

पर मोक्ष होगा या नहीं होगा, वह तो हमसे नहीं कहा जा सकता ।

पूर्णकामपन नहीं माना जाता, मोक्ष आत्यंतिक कैसे होगा ?”

तथापि, सदेह अक्षरधाम में ही बैठे हैं ऐसा कहते हुए आगे लाधीबा कहते हैं,

“प्रभु मिले हमें साक्षात, उन्होंने समझाई सारी बात ।

सदेह बैठे हैं वहां, शुद्ध अक्षरधाम के भीतर ।

ऐसा निश्चय किया है पक्का, स्वामी श्री सहजानंद द्वारा ।

मिले प्रगट पुरुषोत्तमराय, कहो उसके लिए क्या नहीं होता ?”

अंतिम जन्म के कोल (वचन) की प्राप्ति हो गई है परंतु जब तक स्थिति नहीं हुई तब तक मूर्ति का सुख नहीं आता । प्राप्ति से स्थिति तक का मार्ग, यदि जागरूकता न रखे और गाफिल रहे तो अत्यंत कठिन है । क्योंकि प्राप्ति के कैफ से बहक जाने का भय है । पंचविषय और अभाव-अवगुण में खिंच जाने का भय है । प्राप्ति प्रॉमिसरी नोट कहलाती है और स्थिति नकद रुपये कहलाती है । जो प्राप्ति के आनंद से बहक जाते हैं उनका देहाध्यास कभी नहीं छूटता और स्थिति के लिए पात्र नहीं बना जाता । इसलिए स्थिति की पात्रता विकसित करने के लिए राज़ीपा के साधन जागरूकता के साथ करते रहना चाहिए ।

क्या जागरूकता रखनी है ? तो, सत्पुरुष ने वर्तमान धराकर मुझे सदेह मूर्ति में रखा है । स्वयं महाराज देह के स्थान पर आकर विराजमान हो गए हैं - इस समझ का चलते-फिरते सतत अनुसंधान रखकर अभ्यास करने से उसका निरुत्थानपन (अडिगता) होता जाता है जिसे कहते है ज्ञान-स्थिति और ध्यान के द्वारा मूर्ति का साक्षात्कार हो जाए उसे कहते है ध्यान-स्थिति ।

ऐसी स्थिति पाने के लिए विचार तो यही रखना है कि, ‘मैं देहधारी जीव नहीं
हूं । मैं देह से पृथक शुद्ध चैतन्य हूं । मुझे मुक्त करके मूर्ति में रख लिया गया है, अब महाराज ही हैं ।’ और ऐसी समझ और रीति से बर्तने के बावजूद स्वामिनारायण भगवान द्वारा दिए गए पंचवर्तमान का पालन साथ में करते जाना है तभी जीवनमंत्र की चौथी कलम लक्ष्यार्थ हुई कहलाती है कि, ‘सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं ।’

 

स्व-अध्ययन

१. मुझे महाराज और सत्पुरुष मिले हैं । इसलिए उनकी कृपा से मेरा कल्याण हो ही गया है ऐसा कृतार्थपन रहता है ? 

२. ‘सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं’ - इस बात का निरुत्थानपना रहता है ? 

३. मेरा कल्याण तो हो गया परंतु मेरे संपर्क (योग) में आने वाले का भी कल्याण मेरे संबंध से हो गया है - ऐसे पूर्णकामपन में आठों पहर रहा जाता है?

४. प्रतिलोम रूप में महाराज विराजमान हुए हैं इस लटक के अनुसार बर्ताव    होता है ? 

५. प्राप्ति में पूर्णता न मानकर स्थिति पाने के लिए प्रयास होते हैं ? 


 

दृढ़ संकल्प करें कि,

जो कुछ सेवा, भक्ति, साधन करें वह ‘सदेह में मैं मूर्तिधाम में ही हूं’ ऐसे पूर्णकामपन के भाव में रहकर ही करने हैं ।

कलम

सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं

जीवनमंत्र की इस कलम में कारण सत्संग की उत्कृष्ट समझ दी गई है । यही समझ को प्यारे गुरुजी ने ‘अनादिमुक्त हरि मूर्ति में ही हूं मैं’ प्रार्थना में पिरो ली है । यही कारण सत्संग का मूल ज्ञान है, मूल लटक है । इस लटक के अभ्यास से ही अनादिमुक्त की स्थिति की ओर गति होती है ।

इस कलम के परभावी शब्दों को विस्तार से समझते हैं । सर्वप्रथम ‘सदेह’ यानी क्या ? क्या पंचभूत के देह सहित धाम में जा सकते है ? नहीं । मायिक देह से अमायिक, अक्षरातीत पुरुषोत्तम की मूर्ति में कैसे जा सकते है ? परंतु सामान्यतः ऐसी समझ होती है कि मरने के बाद ही धाम में जा सकते है । परंतु कारण सत्संग में सदेह कल्याण के वचन (कॉल) मिलते हैं । संक्षेप में, कारण सत्संग में कल्याण का वायदा नहीं है; नकद कल्याण है । मरने के बाद कल्याण होगा उसे वायदा कहा जाता है और सदेह कल्याण हो गया है उसे नकद कहा जाता है ।

अब धाम का विवरण समझते हैं । पूरे स्वामिनारायण संप्रदाय में अक्षरधाम में जाना है ऐसी समझ प्रचलित है । परंतु बापाश्री द्वारा दिया गया ज्ञान इससे आगे
है । श्रीजीमहाराज ने पंचाला के पहले वचनामृत में कहा है कि, “अक्षरब्रह्म है वह तो भगवान के (हमारे) अंग का प्रकाश है अथवा उनके (हमारे) रहने का धाम
है ।” अर्थात् अक्षरधाम वह श्रीजीमहाराज की मूर्ति से निकलने वाले तेज का समूह है । वह महाराज के रहने का धाम है; मुक्तों का नहीं । मुक्त तो मूर्ति में रहते हैं । इसलिए अक्षरधाम में जाना है वह समझ पूरी नहीं है । अक्षरधाम कार्य है और महाराज की मूर्ति कारण है । हमें महाराज और सत्पुरुष ने कृपा करके अनादिमुक्त करके मूर्ति में रखा है । इसलिए हमारा धाम मूर्ति है । सद्. ब्रह्मानंद स्वामी ने इस लटक को कीर्तन में वर्णित किया है,

“रसबस होय रही रसिया संग, ज्यों मिसरी पय मांही मिली ।”

मूल मुद्दा यहां पूर्णकामपन का है अर्थात् कृतार्थपन का है । इसका अर्थ
क्या ? तो मेरा कल्याण हो ही गया है इसकी अडिग (निरुत्थानपन से) दृढ़ता । इसके लिए पहले कल्याण विषयक कुछ बातें समझना अत्यंत आवश्यक है ।

गढ़ड़ा मध्य के ८वें वचनामृत में महाराज ने कल्याण की अवधारणा बताई है कि, “प्रत्यक्ष भगवान की प्राप्ति ही परमपद है ।” यानी महाराज की मूर्ति ही कल्याण का स्वरूप है । भगवान की प्राप्ति होना ही कल्याण है । अब कल्याण किसका होता है ? तो कीर्तन में कहा गया है कि,

“या तो प्रगट मिले भगवान रे, या तो उनके मिले हुए से कल्याण रे;

उसके बिना कोटि उपाय रे, मोक्ष आत्यंतिक नहीं होवे रे ।”

अर्थात् या तो प्रकट भगवान मिलें या तो उनसे मिले हुए अनादिमुक्त सत्पुरुष मिलें तभी आत्यंतिक कल्याण होता है । गढ़ड़ा प्रथम के ५४वें वचनामृत में भी सत्पुरुष को मोक्ष का द्वार कहा गया है । क्योंकि जीव को कल्याण के कोल (वचन) देने का कार्य महाराज अवरभाव में अदृश्य होने के बाद सत्पुरुष के द्वारा करते
है । सत्पुरुष का मुख्य कार्य ही यही है । उनके दर्शन, स्पर्श, सेवा, समागम या आशीर्वाद में जो कोई जीव आता है, उसके अनंत जन्मों के पाप, पुण्य, कर्म जलाकर विधाता के लेख पर मेख मारकर उसे निराकार में से साकार पुरुषोत्तमरूप करते हैं, मूर्तिरूप करके मूर्ति में रखते हैं और उसके देह के स्थान पर सत्पुरुष की कृपा से महाराज प्रतिलोम रूप में आकर विराजमान होते हैं । इसे कहते है कारण सत्संग के वर्तमान, इसे ही कहते है कल्याण के कोल (वचन) । जो केवल और केवल सत्पुरुष द्वारा ही मिलते हैं । उनके अंतर के राज़ीपा से ही इस ज्ञान की दृढ़ता होती है और अनुभव तक पहुंचा जाता है ।

यह कोल (वचन) मिले उसे कहते हैं प्राप्ति । कारण सत्संग में प्राप्ति बिल्कुल मुफ़्त है । पात्रता के बगैर असीमित मिलती है । परंतु उसके बाद मुमुक्षु को सत्पुरुष के सान्निध्य-समागम से श्रीजीमहाराज के स्वरूप का सर्वोपरी ज्ञान समझकर अनन्य निष्ठा और पंचवर्तमान की आज्ञा दृढ़ करनी पड़ती है । और उसके बाद अपने स्वरूप की पहचान करके ‘सदेह मैं मूर्ति में ही हूं’ इस लटक का अभ्यास करना पड़ता है । ऐसे ही ज्ञान-ध्यान के प्रयास से सत्पुरुष राज़ी होते हैं और अनादि की स्थिति कराते हैं ।

“जिसे परिपूर्ण निश्चय हो वह तो ऐसा समझे कि मुझे ये भगवान मिले उस दिन से ही मेरा कल्याण हो चुका है, और जो मेरा दर्शन करेगा या मेरी बात सुनेगा वह जीव भी सभी पापों से मुक्त होकर परमपद को पाएगा ।”   - वच. वर. १२

इस पूरी अध्यात्म यात्रा में कृतार्थपन बहुत महत्त्वपूर्ण है । इस ज्ञान के अभ्यास की मुख्य रीति यही है कि मेरा कल्याण हो गया है, मूर्ति मिल गई है, अनादिमुक्त ही हूं । ऐसे कृतार्थपन में रहकर स्थिति के लिए प्रयास करना । जिसे बापाश्री ने कहा, “अधूरा मानना नहीं और पूरा मानकर बैठे रहना नहीं ।” फिर, वृंदावनबापा ने कहा, “पड़ाव (मुकाम) छोड़ना नहीं और निशाना चूकना नहीं ।”

हम पर बहुत बड़ी कृपा है कि गुरुदेव प.पू. बापजी और गुरुजी प.पू. स्वामीश्री ने हमारे एस.एम.वी.एस. के पूरे समाज को वर्तमान धराकर, देह - देह के भावों को छुड़ाकर मूर्ति में रख लिया है । परिणाम स्वरूप एस.एम.वी.एस. का छोटा बच्चा भी आज छाती ठोककर कह सकता है कि, ‘सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं । ११०% मेरा आत्यंतिक कल्याण हो ही चुका है ।’

पहले भी जिन भक्तों को श्रीजीमहाराज के स्वरूप की सर्वोपरी निष्ठा दृढ़ हुई थी और सदेह में आत्यंतिक कल्याण की स्वीकृति हो गई थी, उन भक्तों का रजमा (उल्लास), मिली हुई प्राप्ति का कैफ़ वास्तव में वंदनीय, पूजनीय और दर्शनीय
था ।

हलवद के अमरशी खत्री में ऐसा ही पूर्णकामपन रहता था । ध्रांगध्रा नरेश ने जब उनसे पूछा कि, “ऐ अमरशी, तू यह पूरा दिन ‘स्वामिनारायण... स्वामिनारायण...’ करता है तो क्या स्वामिनारायण तेरा कल्याण करेंगे ?” तब अमरशी भक्त ने खुमारी भरा जवाब दिया, “बापू, जिस दिन से मुझे स्वामिनारायण भगवान मिले उस दिन से मेरा तो कल्याण हो ही गया है परंतु मेरे घर में रहने वाले मनुष्य, पशु-पक्षी और कुत्ते-बिल्ली का भी कल्याण हो गया है । इतना ही नहीं, हे नरेश, आज आपने मेरी बात सुनी इसलिए आपका भी कल्याण हो गया, तो फिर मेरे कल्याण में क्या संशय रहे ?” अमरशी भक्त की बात सुनकर ध्रांगध्रा नरेश मन ही मन अमरशी भक्त और भगवान स्वामिनारायण को वंदन करने लगे ।

भुज के महामुक्त लाधीबा ने एक दिन अपने भाई हरजीवनभाई को मिली प्राप्ति की महिमा कहते हुए कहा कि भाई,

“हमारे भाग्य का नहीं कोई पार, सहज ही मिले हैं धर्मकुमार ।

देखो परोक्ष भक्त की रीति, स्वर्ग जाने खर्च करे लाखों वित्त ।

देह-दमन करते हैं मथकर, पर निश्चय कल्याण का नहीं ।

गांव-गिरास बहुत देते, दान देने में कोई कमी नहीं रखते ।

पर मोक्ष होगा या नहीं होगा, वह तो हमसे नहीं कहा जा सकता ।

पूर्णकामपन नहीं माना जाता, मोक्ष आत्यंतिक कैसे होगा ?”

तथापि, सदेह अक्षरधाम में ही बैठे हैं ऐसा कहते हुए आगे लाधीबा कहते हैं,

“प्रभु मिले हमें साक्षात, उन्होंने समझाई सारी बात ।

सदेह बैठे हैं वहां, शुद्ध अक्षरधाम के भीतर ।

ऐसा निश्चय किया है पक्का, स्वामी श्री सहजानंद द्वारा ।

मिले प्रगट पुरुषोत्तमराय, कहो उसके लिए क्या नहीं होता ?”

अंतिम जन्म के कोल (वचन) की प्राप्ति हो गई है परंतु जब तक स्थिति नहीं हुई तब तक मूर्ति का सुख नहीं आता । प्राप्ति से स्थिति तक का मार्ग, यदि जागरूकता न रखे और गाफिल रहे तो अत्यंत कठिन है । क्योंकि प्राप्ति के कैफ से बहक जाने का भय है । पंचविषय और अभाव-अवगुण में खिंच जाने का भय है । प्राप्ति प्रॉमिसरी नोट कहलाती है और स्थिति नकद रुपये कहलाती है । जो प्राप्ति के आनंद से बहक जाते हैं उनका देहाध्यास कभी नहीं छूटता और स्थिति के लिए पात्र नहीं बना जाता । इसलिए स्थिति की पात्रता विकसित करने के लिए राज़ीपा के साधन जागरूकता के साथ करते रहना चाहिए ।

क्या जागरूकता रखनी है ? तो, सत्पुरुष ने वर्तमान धराकर मुझे सदेह मूर्ति में रखा है । स्वयं महाराज देह के स्थान पर आकर विराजमान हो गए हैं - इस समझ का चलते-फिरते सतत अनुसंधान रखकर अभ्यास करने से उसका निरुत्थानपन (अडिगता) होता जाता है जिसे कहते है ज्ञान-स्थिति और ध्यान के द्वारा मूर्ति का साक्षात्कार हो जाए उसे कहते है ध्यान-स्थिति ।

ऐसी स्थिति पाने के लिए विचार तो यही रखना है कि, ‘मैं देहधारी जीव नहीं
हूं । मैं देह से पृथक शुद्ध चैतन्य हूं । मुझे मुक्त करके मूर्ति में रख लिया गया है, अब महाराज ही हैं ।’ और ऐसी समझ और रीति से बर्तने के बावजूद स्वामिनारायण भगवान द्वारा दिए गए पंचवर्तमान का पालन साथ में करते जाना है तभी जीवनमंत्र की चौथी कलम लक्ष्यार्थ हुई कहलाती है कि, ‘सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं ।’

 

स्व-अध्ययन

१. मुझे महाराज और सत्पुरुष मिले हैं । इसलिए उनकी कृपा से मेरा कल्याण हो ही गया है ऐसा कृतार्थपन रहता है ? 

२. ‘सदेह मैं मूर्तिधाम में ही हूं’ - इस बात का निरुत्थानपना रहता है ? 

३. मेरा कल्याण तो हो गया परंतु मेरे संपर्क (योग) में आने वाले का भी कल्याण मेरे संबंध से हो गया है - ऐसे पूर्णकामपन में आठों पहर रहा जाता है?

४. प्रतिलोम रूप में महाराज विराजमान हुए हैं इस लटक के अनुसार बर्ताव    होता है ? 

५. प्राप्ति में पूर्णता न मानकर स्थिति पाने के लिए प्रयास होते हैं ? 


 

दृढ़ संकल्प करें कि,

जो कुछ सेवा, भक्ति, साधन करें वह ‘सदेह में मैं मूर्तिधाम में ही हूं’ ऐसे पूर्णकामपन के भाव में रहकर ही करने हैं ।